Contact Form

Name

Email *

Message *

Tuesday, March 5, 2019

Ek Sher jaisi personally kaise bnaye



1. Personality Kya Hai

पर्सनॅलिटी सिर्फ़ शारीरिक गुणों से ही नही बल्कि विचारों और व्यवहार से भी मिल कर बनती है जो हमारे व्यवहार और समाज में हमारे समायोजन को भी निर्धारित करती है . कोई भी व्यक्ति जन्मजात अच्छी personality ले कर पैदा नही होता है बल्कि सफल होने लिए अपने अंदर गुणों को विकसित करना पड़ता है. ऐसे गुणों को जो दूसरों को प्रभावित करे साथ ही साथ अपने आपको भी develop करे.

शारीरिक रूप से सुंदर होना या intelligent होना व्यक्तित्व का सिर्फ़ एक ही पहलू हैं बल्कि अच्छी personality के लिए ज्ञान का सही उपयोग करना और अपने gestures और posture को उसके अनुरूप बनाना आवश्यक होता है.

Personality या व्यक्तित्व शब्द से हम सब भली प्रकार से परिचित हैं. इस शब्द का प्रयोग हम अपने जीवन में किसी भी व्यक्ति के गुण या attributes के रूप में करते हैं. अकसर ही हम ये कहते हुए पाए जाते हैं कि उस व्यक्ति की personality बहुत अच्छी है या “क्या पर्सनालिटी है!”. पर क्या सही मायनो में हम इस शब्द के व्यापक रूप को समझ पाए हैं . Personality को अकसर लोग शारीरिक आकर्षण या सुंदरता से जोड़ कर देखते हैं पर इस शब्द के व्यापक रूप को हम समझ नहीं पाए हैं .Personality शब्द एक Latin शब्द Persona से derive हुआ है जिसका अर्थ होता है mask ;जिसका उपयोग रोमन लोग थियेटर में काम करने के लिए और अलग-अलग किरदार निभाने के लिए करते थे. इसका अर्थ तो ये हुआ की personality वही है जैसा हम दिखते हैं या दूसरों को नज़र आते हैं. पर ये personality की बहुत ही संकुचित परिभाषा हुई –

अपने व्यक्तित्व को निखारने के लिए पहली आवश्यकता है सही perception क्योकि आप वही देखते हैं जो आप देखना चाहते हैं ‘ we see the things through our mind not through our eyes”, अपने negative emotions से दूर रहना और inferiority complex को दूर करना. ऐसा बिल्कुल भी नही है कि अगर आप physically attractive नही है तो आप की personality अच्छी नही है- मार्टिन लूथर किंग, गाँधी जी , इत्यादि शारीरिक रूप से attractive नही थे पर मानव जाती के लिए इनका व्यक्तित्व एक मिसाल है. क्योकि इन लोगो ने अपने negative emotions पर पर विजय पाई और खुद पर भरोसा किया. Negative emotions पर विजय पाने का उपाय है love yourself, feel good about yourself and make realistic life goals.

अपने साथियों से बेहतर बनने की बजाए कोशिश करे की अपने आप से बेहतर बने. Stress और fear दो बहुत ही बड़े कारण है जो हमारी personality को पूरी तरह से निखरने नही देते, अपने अंदर के डर को पहचानना और उससे मुक्त होने का प्रयास करना अत्यंत आवश्यक है. सबसे बड़ा डर जो किसी भी व्यक्ति के मन में होता है वो है fear of failure जिसे बार बार प्रयास कर के ही दूर किया जा सकता है. Positive attitude, self confidence, self motivation और अच्छी body language का इस्तेमाल कर के अपनी personality को develop किया जा सकता है.

व्यक्तित्व में विचारो और व्यवहारो की भूमिका के साथ साथ physical characteristics को नकारा नही जा सकता . Physical characteristics से अर्थ खूबसूरत चेहरे का नही बल्कि high level of energy, personal hygiene की और activeness से है साथ ही साथ सही manners, how to speak and treat others की knowledge होना अत्यंत आवश्यक है. हमारी personality का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा हमारे personal relationship हैं. किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व इस बात से भी आँका जा सकता है कि वो अपने personal relationships को किस प्रकार manage करता है या उसमे कितना सफल रहा है.

विक्खयात physiologist Hippocrates ने सबसे पहले पर्सनॅलिटी को चार भाग में बांटा था

SANGUINE,
MELANCHOLIC,
PHLEGMATIC,
CHOLERIC.

SANGUINE: उनका मानना था कि Sanguine लोगो में blood की मात्रा अधिक होती है तथा ये खुश रहते हैं और दूसरों को भी खुश रखते हैं तथा ज़्यादा सोच विचार नही करते, melancholic बहुत ही systematic और logical होते है हर चीज़ को सोच समझ के चलते है, phlegmatic लोग शांत प्रवृत्ति के होते है किसी भी बात पर वे अधिक उत्तेजित नही होते और choleric गुस्से वाले होते हैं उनके अंदर leadership quality भी अधिक होती है जिसके कारण वे दूसरों को dominate करते है. इससे आप अंदाज़ा लगा ही सकते हैं कि हर तरह के पर्सनॅलिटी की अपने ही विशेषता है और इस दुनिया में इन चारो प्रकारो की आवश्यकता है ताकि संतुलन बना रहे. हम सब में ये चारो traits या personality होती हैं पर किसी में कोई गुण ज़्यादा है तो किसी में कोई और ये सब शारीरिक गुणों के कारण नही है बल्कि हमारी स्वाभाविक प्रवित्ती के कारण है. हमे एक दूसरे की पर्सनॅलिटी को पहचानना है और उसके हिसाब से adjustment करना है. मान लीजिए की आप sanguine है तो ज़रूरी नही कि आपका साथी भी sanguine हो, हो सकता है की वो melancholic हो या choleric हो बल्कि अगर आप sanguine हैं तो हो सकता है की आप अपने चंचल स्वाभाव के कारण समझदारी से decision ना ले पाए ऐसे में कोई melancholic personality वाला आपको बेहतर गाइड कर सकता है.
हमे सामने वाले की personality को भाँपते हुए react करना चाहिए क्योंकि हर व्यक्ति इस दुनिया में unique है. हमे हर प्रकार के व्यक्तित्व की respect करनी चाहिए और अपनी personality develop करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए, क्योंकि ” personality is to human as fragrance is to flower .”



2. Personality Development



हम रोज़ाना बहुत से लोगों से मिलते हैं पर कुछ -एक लोग ही ऐसे होते हैं जो हमें प्रभावित कर जाते हैं. ऐसे लोगों के लिए ही हम कहते हैं कि, the person has got a pleasant personality. ऐसी personality वाले लोग अक्सर खुशहाल होते हैं और उनकी हर जगह respect होती है, उन्हें like किया जाता है, parties में invite किया जाता है और job में इन्हें promotion भी जल्दी मिलता है.
व्यक्तिगत विकास (Personality Development ), वैसे तो हम इस शब्द को हमेशा ही अपने गुरुजनों, शिक्षकों और सकारात्मक बातों से जुडी किताबों में पढ़ते आयें हैं लेकिन कभी हमने सोचा है जीवन में इस शब्द की अहमियत कितनी हद तक है। व्यक्तिगे विकास क्या जीवन में आपका बोलने का तरीका, आपके पहनाव का तरिका या आप लोगों से कितनी आसानी से जुड़ते या नेटवर्क बनाते हैं मित्रता करते हैं उसका तरीका है? जी नहीं यह इन चीजों से परे है। कैसे? चलिए समझते हैं।
Personality Development पढने से पहले आइये एक कहानी से personality का महत्व समझते है.

आप एक मूवी देखने गए, आप लाइन में खड़े है, पीछे से एक व्यक्ति आया और लाइन तोड़ कर सबसे पहले खिड़की के नजदीक पहुच गया। इसी स्थिति तक़रीबन हर किसी के साथ होती है। और इसी स्थिति पे आपका रिएक्शन आपकी Personality को प्रकट करता है। आपके रिएक्शन से आपका attitude बनता है, और आपके attitude से लोगो के बीचे में आपका इमेज। ये आपके रिएक्शन पर निर्भर करता है कि आप movie को एन्जॉय कर पाओगे के नहीं। सही रिएक्शन आपको तनाव से बचाता है और आपकी इमेज को अच्छा बनता है जबकि गलत रिएक्शन आपको थकान देता है और आपकी इमेज को भी ख़राब करता है। स्थिति को हैंडल करना एक कला है, जिसका आपकी personality पर अच्छा प्रभाव पढता है और आप उससे बड़ी हर स्थिति को वैसे ही हैंडल करते हो। अब इस स्थिति में जो मैंने मूवी के खिड़की के आगे के लाइन की स्थिति बताई है। इस स्थिति में तीन रिएक्शन हो सकते है।

1) आप लाइन तोड़ रहे बन्दे को देखते हो भड़क जाते हो और चिल्लाते हो। और कहते हो “ओ भाई हम भी लाइन में खड़े है लाइन में आओ” और जब वो बन्दा आपके पीछे नहीं खड़ा होता जाता आपको चेन नहीं मिलता है।
2) आप शांति से खड़े रहते है कि यार अब क्या कर सकते है, बरदास तो करना ही पड़ेगा ना।
3) आप मुस्कुराते हुए बड़े अच्छे व्यव्हार से उस व्यक्ति को कहते हो “सुनिए भाई शाहब आप प्लीज लाइन में आ जाइये, थैंक यू”

अब आपको क्या लगता है कोनसा रिएक्शन सही है?

पहला भड़कना और चिल्लान, ये रिएक्शन सही नहीं है और सायद आप भी इस बात को मानते हो कि यह रिएक्शन सही नहीं है। लेकिन जानते हुए भी इसी रिएक्शन को देखते हो। इस रिएक्शन के कितने साइड इफ़ेक्ट है ये सायद आपने सोचे भी नहीं होगे। आपकी BP हाई हुआ, आपको थकान मिली, जगडा बढ़ सकता है और आपकी एंजोयमेंट वो भी ख़तम।
हर बार गुस्स्सा आपके चेहरे पे एक जुर्री छोड़ देता है और आप इस अगले seen को अपने साथ दौराते हो। और अपने घर में अपने workplace में इस पर बार-बार बातचीत करते हो और इस तरह आप का जो व्यवहार है वो एसा ही बन जाता है और हर स्थिति पे आप ऐसा ही react करते हो।
दूसरा शांति से खड़े रहना और बरदास करना ये सायद आप करते भी नहीं हो और करना भी नहीं चाहिए आपके दिमाग में अपने बारे में एक इमेज बनता है जो समय के साथ-साथ और गहरा होता जाता है और आपका जो आत्मविश्वास है वो कम होता जाता है। इससे आपका एक व्यवहार बन जाता है कि हर जगह पर पीछे-पीछे ही रहना है।
यह व्यवहार आपको कभी जितने नहीं देता है, जोखिम लेने की क्षमता कम कर देता है और धीर-धीरे आप success से दूर हो जाते हो और failure के नजदीक होते होते हो।
अब बचा तीसरा शिष्टाचार, नर्मता से, मुस्काराते हुए अपनी बात कहनी और थकान भी ना लेना और गुस्सा भी नहीं होना।

मेरे अनुभव यह कहता है की ज्यादातर समय आपकी मुस्कराहट आपको जीता देता है। लेकिन फिर भी वो व्यक्ति नहीं मानता है तो मेरी राय है कि शांत रहिये लेकिन किसी भी हालत पहले वाले रिएक्शन पे नहीं जाना है। तीसरा रिएक्शन से यानी मुस्कुराते हुए रहने से 10 स्थिति में से आप 7 स्थिति पर आप जरुर ही जीत जाओगे और इस तरह से आपका confidence बढ़ने लगेगा और इस तरह से आपका पॉजिटिव/सकारात्मक attitude होगा। लोगो के बिच में आपकी इमेज और अच्छा होगा। आपकी इज्जत बढ़ेगी और लोग आप पर विश्वास करेगे। आपको थकान भी नहीं होगी और आपका personality भी सही रहेगा और यह attitude आपको success के और नजदीक ले जाएगा।



3. Confidence

Confidence (आत्मविश्वास) से आशय “स्वंय पर विश्वास एंव नियंत्रण” (Believe in Yourself) से है | हमारे जीवन में आत्मविश्वास (Self Confidence) का होना उतना ही आवश्यक है जितना किसी फूल (Flower) में खुशबू (सुगंध) का होना| आत्मविश्वास (Self Confidence) के बगैर हमारी जिंदगी (Life) एक जिन्दा लाश के समान हो जाती है | कोई भी व्यक्ति कितना भी प्रतिभाशाली (Intelligent) क्यों न हो वह आत्मविश्वास के बिना कुछ नहीं कर सकता | आत्मविश्वास ही सफलता (Success) की नींव है, आत्मविश्वास की कमी के कारण व्यक्ति अपने द्वारा किये गए कार्य पर संदेह करता है और नकारात्मक विचारों (Negative Thoughts) के जाल में फंस जाता है | आत्मविश्वास (Self Confidence) उसी व्यक्ति के पास होता है जो स्वंय से संतुष्ट होता है एंव जिसके पास दृड़ निश्चय, मेहनत (Hard work), लगन (Focused), साहस (Fearless ) , वचनबद्धता (Commitment) आदि संस्कारों (Sanskar) की सम्पति होती है |

आत्मविश्वास कैसे बढाएं:
1. स्वंय पर विश्वास रखें (Believe in Yourself), लक्ष्य बनायें (make smart goals) एंव उन्हें पूरा करने के लिए वचनबद्ध रहें | जब आप अपने द्वारा बनाये गए लक्ष्य (Goals) को पूरा करते है तो यह आपके आत्मविश्वास (Self Confidence) को कई गुना बढ़ा देता है |
2. खुश रहें (Be Happy), खुद को प्रेरित करें (Motivate Yourself), असफलता (Failure) से दुखी न होकर उससे सीख लें क्योंकि “experience हमेशा bad experience से ही आता है”
3. सकारात्मक सोचें (Think Positive) ,विनम्र रहें एंव दिन की शुरुआत किसी अच्छे कार्य से करें (starting the day with a positive attitude)|
4. इस दुनिया में नामुनकिन कुछ भी नहीं है | आत्मविश्वास का सबसे बड़ा दुशमन किसी भी कार्य को करने में असफलता होने का “डर” (Fear of Failure) है एंव डर को हटाना है तो वह कार्य अवश्य करें जिसमें आपको डर लगता है |
5. सच बोलें, ईमानदार रहें, धूम्रपान न करें, प्रकृति से जुड़े, अच्छे (Good) कार्य करें ,जरुरतमंद की मदद करें (Be Helpful)| क्योंकि ऐसे कार्य आपको सकारात्मक शक्ति (positive power) देते हैं वही दूसरी ओर गलत कार्य एंव बुरी आदतें (Bad Habits) हमारे आत्मविश्वास को गिरा देते हैं |
6. वह कार्य करें जिसमें आपकी रुचि हो एंव कोशिश करें कि अपने करियर (Career) को उसी दिशा में आगे ले जिसमें आपकी रुचि हो |
7. वर्तमान में जियें (Live in Present) ,सकारात्मक सोचें (Think Positive), अच्छे मित्र बनायें, बच्चों से दोस्तीं करें, आत्मचिंतन करें |
8. ऐसे लक्ष्य (S.M.A.R.T. Goal) बनाएँ जिसे आप प्राप्त कर सकें (Achievable and Realistic Goals)| क्योंकि जब आप ऐसे लक्ष्य (TARGET) बनाते है जिसे आप पूरा नहीं कर सकते तो यह आपके self confidence (Aatmvishwash) को गिरा देते है और आपका स्वंय पर विश्वास कम हो जाता है | लक्ष्य S.M.A.R.T. होना चाहिए- Specific (स्पष्ट)
– Measurable (मापां जा सकने योग्य) – Achievable (प्राप्त किया जा सके), – Realistic (वास्तविक) -Time-Bound (निर्धारित समय सीमा में पूरा होने लायक)
9. हमेशा आसान काम पहले करें और मुश्किल काम बाद में| क्योंकि जब आप पहले आसान कार्य अच्छे से कर लेते है तो दबाव कम हो जाता है और confidence बढ़ता है जिससे मुश्किल कार्य भी आसान बन जाता है |
10. आप यह मत सोचिये कि लोग आपके बारे में क्या सोचेंगे :- “सबसे बड़ा यही रोग क्या कहेंगे लोग (Sabse bada rog kya kahenge log)| ज्यादातर लोग कोई भी कार्य करने से पहले कई बार यह सोचते है की वह कार्य करने से लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे या क्या कहेंगे और इसलिए वे कोई निर्णय ले ही नहीं पाते एंव सोचते ही रह जाते है एंव समय उनके हाथ से पानी की तरह निकल जाता है| ऐसे लोग हमेशा डर-डर के जीते है और बाद में पछताते हैं |
11. व्यवहारकुशल बनें और हमेशा नम्रता व मुस्कराहट (Smile) के साथ व्यवहार करें | इससे न केवल आपका आत्मविश्वास (Self Confidence) बढेगा बल्कि इससे आपके अच्छे मित्रों की संख्या भी बढ़ेगी| अच्छे मित्र हमेशा मदद करने के लिए तैयार रहते है और आपके सुख दुःख में हमेशा आपके साथ होते है |
12. Motivational Seminars में हिस्सा लें, ऐसे Television Program या videos देखें जो आपको inspire or motivate करे, Self Improvement and Personal Development की किताबे एंव प्रेरणादायक लेख (Motivational Articles) पढ़े| ऐसे प्रेरणादायक लेख (Motivational Articles) एंव किताबें हमारे mind को recharge कर देती है |
13. Meditation (ध्यान), योग (Yoga) एंव प्राणायाम (pranayam) करें| अपने लिए समय निकालें और कुछ समय एकांत में बिताएं| स्वंय से बात करें (Talk to Yourself) और यह Feel (महसूस) करें कि आप एक बेहतर इन्सान है |
14. अपनी सफलताओं को याद करें और visualize (कल्पना) करें कि आप कुछ भी कर सकते है (You can do anything) और आपके लिए नामुकिन कुछ भी नहीं (Nothing is Impossible for You)|
15. हमेशा चिंतामुक्त (Tension Free) रहने की आदत बनायें, रचनात्मक तरीके से सोचें (Creative Thinking) और कुछ न कुछ नया करते रहें (Do Something New and Creative)| दिन में कुछ समय संगीत सुनने, खेलने अथवा रचनात्मक कार्यों के लिए जरूर निकालें (Do something different)|
16. आत्मनिर्भर बनें एंव जितना हो सके अपने कार्य स्वंय करने की कोशिश करें | आत्मनिर्भरता से आपका confidence लेवल बढ़ता है |
17. या तो ऐसे कार्य न करें जिसमे आपका interest नहीं और और आप अपना 100% नहीं दे सकते या फिर इन कार्यों में अपना interest बनाएं और Best करें | क्योंकि जब आप बिना interest के कोई काम करते है तो आप का confidence level गिरता है |
18. उस बारे में सोचना बंद कर दें जिस पर हमारा नियंत्रण न हो, अगर आप उस बातों या परिस्थियों की वजह से दुखी हो जाते है जो आपके नियंत्रण में नहीं है तो इसका परिणाम समय की बर्बादी व भविष्य पछतावा है जिससे आपका self confidence गिरता है |
19. दृढ निश्चय (Commitment) :- आप अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहें और अपना 100% दें | मेहनत व लगन से बड़े से बड़ा मुश्किल कार्य आसान हो जाता है | अगर लक्ष्य को प्राप्त करना है तो बीच में आने वाली बाधाओं को पार करना होगा, मेहनत करनी होगी, बार बार दृढ़ निश्चय से कोशिश करनी होगी |

अगर आपको सफल होना है तो अपने लक्ष्य पूरे करने की आदत बनाईये न कि उन्हें बार बार बदलने की| अगर आपका अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चय नहीं है तो आपके confidence का गिरना तय है |

4. Positive Thinking
1. प्रोटोन की तरह सकारात्मक बने
प्रोटोन कभी अपनी सकारात्मकता (धनात्मकता) नहीं खो सकता है और वैसे ही आप भी कभीनहीं! ये बस तनाव से ढक सकता है और तनाव आपकी ऊर्जा खींच लेता है । सकारात्मकरहकर आप कठिन से कठिन चुनौतियों को पार कर जाते है और साथ ही और अधिक सकारात्मकता और संभावनाओं को अपनी ओर आकर्षित करते है ।
2. अधिक जोशीले हों
किसी काम को कराने का सबसे अच्छा तरीका है उसके लिए अधिक से अधिक जोशीला होना । जब आप पूरे जोश के साथ प्रयास करते हैं तब जीवन में श्रेष्ठता को स्वतः उपलब्ध होते हैं ।
3. भावनाओं को सावधानी के साथ संभालें
जिंदगी जब आपको रोलर कोस्टर की सैर कराये तो उसका पूरा आनंद लेना न भूलें । अपनीभावनाओं को परिस्थितियों पर राज करने न दें बल्कि उनको काबू में रखें। ये आपको चुनौतियोंके समय शांत व एकाग्र रखेगा ।
4. स्वयं पर और औरों पर करुणा करें
अधिक करुणामय हों। अगली बार जब आप या कोई और गलती करें तो मन में कोई गांठ नबांधें, जाने दें। इस बात को समझे कि हम सभी विकसित हो रहे हैं और कोई भी पूर्ण नहीं है । ये नजरिया स्वयं को और औरों को स्वीकारने में मदद करता है।
5. प्रसंशा करें
जब हम किसी के गुणोंकी की प्रसंशा पूर्णता के भाव से करते हैं, तो हमारी चेतना का विस्तार होताहै, जो हमारे भीतर उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है । वे गुण हमारे भीतर भी विकसितहोने लगते है और हम बेहतर मानव बनते हैं।
6. प्रभावशाली संवाद करें
हम लोगों से संवाद मुख्यतया या तो अपनी उपस्थिति से या फिर अपनी भावनाओं कीअभिव्यक्ति से करते हैं । अपने संवाद में स्पष्टता लाते ही आप देखेंगें की लोग बेहतर प्रतिक्रियादे रहे हैं और अधिकतर जो आपके लिए लाभकारी भी है ।
7. खतरों का सामना साहस से करें
यदि आप मुसीबत के समय उसको चुनौती देने के लिए उठ खड़े होते हैं तो आपके मुसीबत के पार जाने की सम्भावना अधिक होती है । किसी दबाव के आगे झुके नहीं बल्कि पूरे विश्वास सेउसका सामना करें । इसमें या तो आप विजयी होंगे या फिर जीवन के लिए कुछ अमूल्य सीखेंगें।
8. जीवन में धीरज अपनाये
जीवन में विजेता होने के लिए धीरज एक गुप्त घटक है । भड़भड़ाहट और अधीरता से की प्रतिक्रिया फायदे से ज्यादा हानि पहुंचाती है। ध्यान रहे, हमें शांति और धीरज रखनी चाहिए, जिससे हम तनाव रहित होकर समझदारी से भरे त्वरित निर्णय ले सकेगें।
9. सही साँस लेने की कला सीखे
अंतिम, पर सबसे महत्वपूर्ण, सही साँस लेना सीखें। अक्सर इस बात को अनदेखा कर देते है कि सही साँस लेने से आप एक तनाव रहित और सकारात्मक जीवन पा सकते हैं। सुदर्शन क्रिया सीखे और साँस की छुपी शक्ति का उपयोग करें । साँस की इस प्रभावी तकनीक से आप शारीरक, मानसिक और भावनात्मक तनावों से मुक्त होते हैं।

जब आप सुदर्शन क्रिया सीखकर सही साँस लेते है तब आप अपने आपसी संबंधों के सुधार का तरीका पा जाते हैं और अपने व्यक्तित्व के आकर्षक पहलू को और निखारते हैं।

5. Body Language

हमारे जीवन पर Body Language का प्रभाव
मौजूदा कॉर्पोरेट इंडिया को सिर्फ डिग्रियों से लैस एंप्लॉइज की तलाश नहीं होती, बल्कि यह जमाना स्मार्ट एंप्लॉई का है। स्मार्टनेस से मतलब ऐसे एंप्लॉई से है, जिसमें प्रफेशनल क्वॉलिफिकेशन तो हो ही, साथ ही वह सॉफ्ट स्किल्स से भी भरपूर हो। अगर आप भी स्कूल में अपनी Body Language पर खासा ध्यान देते हैं, तो आपकी यह कुशलता आपको बाकी लोगों से अलग बनाएगी।
हमारा दिमाग लगभग हर बॉडी पॉस्चर से निकलने वाले संकेत को समझ सकता है। सही Body Language को सीखना फॉरन लैंग्वेज सीखने जैसा है। हमें रोजमर्रा की आदतों में कुछ बेसिक पॉस्चर्स पर ध्यान देना चाहिए, जैसे : हमेशा आई कॉन्टैक्ट रखकर बात करना, थोड़ी-सी मुस्कान का महत्व जानना, हाथ बांधकर बातें करने से बचना, खुली हथेलियां गंभीरता और रेसेप्टिविटी को दर्शाती हैं, हाथ हिलाकर बातचीत करने से समझा जाता है कि आप बड़ी रुचि से बातें कर रहे हैं, जबकि मुंह के ऊपर या चेहरे पर हाथ रखना नेगेटिव Body Language का हिस्सा है। आपके रिलेक्स्ड पॉस्चर का मतलब होगा कि आप कम्युनिकेशन के लिए तैयार हैं। स्कूल में कभी भी किसी भी स्तर के व्यक्ति से ऊंची आवाज और तेज स्पीड में बात नहीं करनी चाहिए। इससे आप अपने व्यक्तित्व की गंभीरता खो देंगे।
अगर आप किसी व्यक्ति से फोन पर बात करें और उसी व्यक्ति से आमने-सामने बात करें, तो दोनों स्थितियों के नतीजों में जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है। इसके पीछे है दोनों व्यक्तियों की Body Language। दरअसल, Body Language का प्रभाव हमारे जीवन के हर पल पर पड़ता है, भले ही हम इसे महसूस करें या नहीं? करियर में आगे बढ़ने के लिए भी जितनी जरूरी अच्छी परफॉर्मेंस है, उतना ही जरूरी है अपनी Body Language पर ध्यान देना।
इसके अलावा, अगर आपके अंदर अन्य लोगों की Body Language पढ़ने का भी हुनर है, तो यह बात सोने पर सुहागा साबित होगी। अगर आप सेल्स के फील्ड में हैं, तो Body Language समझने की कला आपके करियर को आगे बढ़ाने में बहुत मददगार साबित हो सकती है। आपको अपने संभावित ग्राहक की Body Language देखकर ही

6. Communication 🎿 skills

कम्युनिकेशन एक सीखने वाली कला है और अपने सहज भाव में ही यह सबसे अधिक प्रभावी दिखती है। उदाहरण के लिए स्वतः स्फूर्त तौर पर दी गई स्पीच का औपचारिक तौर पर दिए गए भाषण से अधिक असर होता है। बेशक एक असरदार कम्युनिकेटर के तौर पर अपने हुनर को चमकाने के लिए किसी को भी समय लगता है, परंतु सहज और प्राकृतिक कम्युनिकेशन के लिए किया गया अधिकाधिक अभ्यास अंततः काम आता है। असरदार कम्युनिकेशन व्यक्ति या परिस्थिति को समझने में मदद करता है। इसके जरिए आपसी मतभेद दूर होता है, भरोसा और आदर बढ़ता है। इसमें उच्चारित शब्द और भाव बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं, जिनके जरिए रचनात्मक विचार पनपते हैं, समस्याएं सुलझती हैं और सहयोग बढ़ता है। ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्ति और परिस्थितियों के आधार पर ही कम्युनिकेशन का पैमाना तय होता है। कुछ इसी तरह स्पष्ट और असरदार लेखन क्षमता भी कुशल कम्युनिकेशन की पहचान बनती है, वहीं कमजोर लेख पढ़ने वाले के लिए रुकावट बनते हैं। उदाहरण के लिए नवयुगीन संचार माध्यमों में ईमेल और सोशल मीडिया में कई बार लिखे गए शब्दों की गंभीरता को समझने में गलती होती है। इसलिए अपनी भाषा, भावों के साथ-साथ व्याकरण को भी स्पष्टता दें, वैसे भी जीवन में किसी भी विषय पर लिखने से पूर्व कुछ देर तक अपने विचारों को सहेजना जरूरी होता है।

1. प्रोटोन की तरह सकारात्मक बने
प्रोटोन कभी अपनी सकारात्मकता (धनात्मकता) नहीं खो सकता है और वैसे ही आप भी कभीनहीं! ये बस तनाव से ढक सकता है और तनाव आपकी ऊर्जा खींच लेता है । सकारात्मकरहकर आप कठिन से कठिन चुनौतियों को पार कर जाते है और साथ ही और अधिक सकारात्मकता और संभावनाओं को अपनी ओर आकर्षित करते है ।

2. अधिक जोशीले हों
किसी काम को कराने का सबसे अच्छा तरीका है उसके लिए अधिक से अधिक जोशीला होना । जब आप पूरे जोश के साथ प्रयास करते हैं तब जीवन में श्रेष्ठता को स्वतः उपलब्ध होते हैं ।

3. भावनाओं को सावधानी के साथ संभालें
जिंदगी जब आपको रोलर कोस्टर की सैर कराये तो उसका पूरा आनंद लेना न भूलें । अपनीभावनाओं को परिस्थितियों पर राज करने न दें बल्कि उनको काबू में रखें। ये आपको चुनौतियोंके समय शांत व एकाग्र रखेगा ।

4. स्वयं पर और औरों पर करुणा करें
अधिक करुणामय हों। अगली बार जब आप या कोई और गलती करें तो मन में कोई गांठ नबांधें, जाने दें। इस बात को समझे कि हम सभी विकसित हो रहे हैं और कोई भी पूर्ण नहीं है । ये नजरिया स्वयं को और औरों को स्वीकारने में मदद करता है।

5. प्रसंशा करें
जब हम किसी के गुणोंकी की प्रसंशा पूर्णता के भाव से करते हैं, तो हमारी चेतना का विस्तार होताहै, जो हमारे भीतर उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है । वे गुण हमारे भीतर भी विकसितहोने लगते है और हम बेहतर मानव बनते हैं।

6. प्रभावशाली संवाद करें
हम लोगों से संवाद मुख्यतया या तो अपनी उपस्थिति से या फिर अपनी भावनाओं कीअभिव्यक्ति से करते हैं । अपने संवाद में स्पष्टता लाते ही आप देखेंगें की लोग बेहतर प्रतिक्रियादे रहे हैं और अधिकतर जो आपके लिए लाभकारी भी है ।

7. खतरों का सामना साहस से करें
यदि आप मुसीबत के समय उसको चुनौती देने के लिए उठ खड़े होते हैं तो आपके मुसीबत के पार जाने की सम्भावना अधिक होती है । किसी दबाव के आगे झुके नहीं बल्कि पूरे विश्वास सेउसका सामना करें । इसमें या तो आप विजयी होंगे या फिर जीवन के लिए कुछ अमूल्य सीखेंगें।

8. जीवन में धीरज अपनाये
जीवन में विजेता होने के लिए धीरज एक गुप्त घटक है । भड़भड़ाहट और अधीरता से की प्रतिक्रिया फायदे से ज्यादा हानि पहुंचाती है। ध्यान रहे, हमें शांति और धीरज रखनी चाहिए, जिससे हम तनाव रहित होकर समझदारी से भरे त्वरित निर्णय ले सकेगें।

9. सही साँस लेने की कला सीखे
अंतिम, पर सबसे महत्वपूर्ण, सही साँस लेना सीखें। अक्सर इस बात को अनदेखा कर देते है कि सही साँस लेने से आप एक तनाव रहित और सकारात्मक जीवन पा सकते हैं। सुदर्शन क्रिया सीखे और साँस की छुपी शक्ति का उपयोग करें । साँस की इस प्रभावी तकनीक से आप शारीरक, मानसिक और भावनात्मक तनावों से मुक्त होते हैं।
जब आप सुदर्शन क्रिया सीखकर सही साँस लेते है तब आप अपने आपसी संबंधों के सुधार का तरीका पा जाते हैं और अपने व्यक्तित्व के आकर्षक पहलू को और निखारते हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु

- सकारात्मक और स्पष्ट कम्युनिकेशन का एक रहस्य आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से भी जुड़ा होता है। अपने व्यक्तित्व के इन दोनों पक्षों को समझ कर कार्य में ही नहीं, जीवन के प्रत्येक पक्ष में सकारात्मक दृष्टिकोण से काम किया जा सकता है। - कुशल कम्युनिकेशन स्किल अपने कहे पर अडिग रहने से भी मजबूत होती है। यह पक्ष आत्मविश्वास के जरिए मजबूत होता है। - तनाव, अवसाद या क्रोध के समय कम्युनिकेशन असरदार नहीं होता। कार्यस्थल पर इन नकारात्मक पक्षों से दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए। - अपने सहकर्मी या बॉस की बात सुनते समय उसी समय दोहराने की आदत इस ओर इशारा करती है कि आपने उनकी बात को गौर से सुना और समझा है। इससे दोनों पक्षों को किसी किस्म की उलझन को सुलझाने में सहूलियत होती है। - इसी तरह नॉन-वर्बल कम्युनिकेशन यानी शब्दहीन संवाद के दौरान Body Language, चेहरे के भावों, इशारों, आंखों के संपर्क, बैठने के तरीके, मांसपेशियों के तनाव और सांस लेने-छोड़ने को समझना भी कुशल कम्युनिकेशन का जरूरी अंश होता है। - सार्वजनिक स्थानों, बसों, ट्रेन, कैफे, रेस्तराओं में बैठे लोगों को देख कर या मूक चलचित्रों के जरिए मूक संवाद को समझने का अभ्यास किया जा सकता है।

7. Manner's

ऐसी बुरी आदतें जिन्हें हम हर दिन दोहराते हैं 

आज हम ऐसी बुरी आदतों के बारे में बात करेंगे, जिनमें से ज्यादातर बुरी आदतों को हम लगभग हर दिन दोहराते हैं. और ये आदतें हमें लगातार नुकसान पहुंचाती है. इन आदतों को सुधारकर हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं.
समय बर्बाद करना – ज्यादातर लोग अपने समय को लेकर सतर्क नहीं रहते हैं और इस कारण वे हर दिन गैर जरूरी कामों में अपने कई घंटे बर्बाद कर देते हैं. और यह बुरी आदत ढेरों लोगों में पाई जाती है.
Health के लिए समय नहीं निकालना – हमलोग स्वस्थ्य तो रहना चाहते हैं, लेकिन स्वास्थ्य के लिए समय नहीं निकालते हैं. अगर आप स्वास्थ्य के लिए समय निकालेंगे, तो आने वाले समय में कई परेशानियों से बचेंगे.
Internet – इन्टरनेट हमारे जीवन को सरल बनाने के लिए है, लेकिन कुछ लोग इन्टरनेट का उपयोग अपना समय बर्बाद करने के लिए करते हैं. हमें इन्टरनेट का उपयोग जरुर करना चाहिए लेकिन यह भी ध्यान देना चाहिए कि इसका हमारे जीवन पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े.
दूसरों की जिंदगी में बेवजह दखल देना – बहुत सारे लोगों की बुरी आदत होती है कि वे Directly या Indirectly दूसरों की जिंदगी में दखल देते रहते हैं. यह आदत न तो आपके लिए अच्छी है और न सामने वाले व्यक्ति के लिए.
अपनी बुराइयाँ दूर न करना – ज्यादातर लोग अपनी बुराई देखने की कोशिश हीं नहीं करते हैं. और बहुत कम लोग अपनी बुराई दूर करने की कोशिश करते हैं. याद रखिए आप अपनी बुराइयों को दूर किए बिना अपनी जिंदगी को बेहतर नहीं बना सकते हैं.
खुद को बेहतर बनाने के लिए कोशिश न करना – हम में से ज्यादातर लोगों की समस्या यह है कि हम अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के ख्वाब तो देखते हैं लेकिन अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं करते हैं.
अपने से कमजोर पर ताकत दिखाना – लगभग हर इन्सान की यह कमजोरी होती है कि वह अपने मन की भड़ास अपने से कमजोर व्यक्ति पर निकलता है.
सोचना बहुत ज्यादा पर करना कुछ भी नहीं – बहुत सारे लोग बहुत सारी चीजें सोचते हैं लेकिन करते कुछ नहीं इसी कारण से वो अपने जीवन में कोई खास उपलब्धि न प्राप्त कर पाते हैं.


हम रोज़ाना बहुत से लोगों से मिलते हैं पर कुछ -एक लोग ही ऐसे होते हैं जो हमें प्रभावित कर जाते हैं. ऐसे लोगों के लिए ही हम कहते हैं कि, the person has got a pleasant personality. ऐसी personality वाले लोग अक्सर खुशहाल होते हैं और उनकी हर जगह respect होती है, उन्हें like किया जाता है, parties में invite किया जाता है और job में इन्हें promotion भी जल्दी मिलता है. Naturally, हम सभी ऐसी personality possess करना चाहेंगे और आज मैं अपने इस article में ऐसे ही 10 points share कर रहा हूँ जो आपको एक आकर्षक व्यक्तित्व पाने में help कर सकते हैं.

1. लोगों को genuinely like करिए :
जब हम किसी से मिलते हैं तो मन में उस person की एक image बना लेते हैं. ये image positive, negative या neutral हो सकती है. पर अगर हम अपनी personality improve करना चाहते हैं तो हमें इस image को intentionally positive बनाना होगा. हमें अपने mind को train करना होगा कि वो लोगों में अच्छाई खोजे बुराई नहीं. ये करना इतना मुश्किल नहीं है, अगर आप mind को अच्छाई खोजने के लिए निर्देश देंगे तो वो खोज निकालेगा.
हमें लोगों के साथ patient होना चाहिए, उनकी किसी कमी या shortcoming से irritate होने की बजाये खुद को उनकी जगह रख कर देखना चाहिए. क्या पता अगर हम भी उन्ही जैसे circumstances में पले-बढे होते तो उन जैसे ही होते!!! इसलिए differences को सेलिब्रेट करिए उनसे irritate मत होइये.
Friends, हमारे चारो -तरफ फैली negativity हमें बहुत प्रभावित करती है, हम रोज़ चोरी, धोखा-धडी, fraud की खबरें सुनते हैं और शायद इसी वजह से आदमी का आदमी पर से विश्वास उठता जा रहा है. मैं ये नहीं कहता की आप आँख मूँद कर लोगों पर trust करिए, पर ये ज़रूर कहूँगा कि आँख मूँद कर लोगों पर distrust मत करिए. ज्यादातर लोग अच्छे होते हैं; कम से कम उनके साथ तो होते ही हैं जो उनके साथ अच्छा होता है, आप लोगों के साथ अच्छा बनिए, उन्हें like करिए और बदले में वे भी आपके साथ ऐसा ही करेंगे.
Ralph Waldo Emerson ने कहा भी है,
“मैं जिस व्यक्ति से भी मिलता हूँ वह किसी ना किसी रूप में मुझसे बेहतर है.
तो जब हर कोई हमसे किसी न किसी रूप में बेहतर है तो उसे like तो किया ही जा सकता है!”

2. मुसकुराहट के साथ मिलिए :
जब आप अपने best friend से मिलते हैं तो क्या होता है? आप एक दूसरे को देखकर smile करते हैं, isn’t it?
मुस्कराना जाहिर करता है कि आप सामने वाले को पसंद करते हैं. यही बात हर तरह की relations में लागू होती है; इसलिए आप जब भी किसी से मिलें ( of course कुछ exceptions हैं ) तो चहरे पर एक genuine smile लाइए, इससे लोग आपको पसंद करेंगे, आपसे मिलकर खुश होंगे. आपकी मुस्कराहट के जवाब में मुस्कराहट न मिले ऐसा कम ही होगा, और होता भी है तो let it be आपको अपना part अच्छे से play करना है बस.
ये सुनने में काफी आसान लग रहा होगा, करना ही क्या है, बस हल्का सा smile ही तो करना है, बहुत से log naturally ऐसा करते भी हैं; पर बहुत से लोग इस छोटी सी बात पर गौर नहीं करते, और अगर आप भी नहीं करते तो इसे अपनी practice में लाइए. एक मुस्कुराता चेहरा एक flat या stern face से कहीं अधिक आकर्षक होता है, और आपकी personality को attractive बनाने में बहुत मददगार होता है.
मुस्कुराने से एक और फायदा भी है, as per some research; जब हम अन्दर से खुश होते हैं तो हमारे एक्सटर्नल expressions उसी हिसाब से change हो जाते हैं, हमें देखकर ही लोग समझ जाते हैं कि हम खुश हैं; और ठीक इसका उल्टा भी सही है, यानि जब हम अपने बाहरी expressions खुशनुमा बना लेते हैं तो उसका असर हमारे internal mood पर भी पड़ता है और वो अच्छा हो जाता है.
So, don’t forget to carry a sweet smile wherever you go.

3. नाम रहे ध्यान :
किसी व्यक्ति के लिए उसका नाम दुनिया के बाकी सभी नामों से ज्यादा importance रखता है. इसिलए जब आप किसी से बात करें तो बीच-बीच में उसका नाम लेते रहिये. Of course अगर व्यक्ति आपसे senior है तो आपको नाम के साथ ज़रूरी suffix या prefix लगाना होगा.
बीच-बीच में नाम लेने से सामने वाला अपनी importance feel करता है और साथ ही आपकी तरफ ध्यान भी अधिक देता है. And definitely वो इस बात से खुश होता है कि आप उसके नाम को importance दे रहे हैं.
Friends, नाम याद रखने में मैं भी थोडा कच्चा था, यहाँ तक कि कई बार नाम जानने के 2 minute बाद ही वो ध्यान से उतर जाता था. ऐसा basically इसलिए होता था क्योंकि मैं नाम याद रखने की कोशिश ही नहीं करता था; पर अब मैं intentionally एक बार नाम सुनने के बाद उसे याद रखने की कोशिश करता हूँ. आप भी “नाम की महत्ता को समझिये ”, नाम याद रखना आपको एक बहुत बड़ी edge दे देता है.

4. “I” से पहले “You” को रखिये:
आप किसे अधिक पसंद करेंगे : जो अपने मतलब की बात करे या उसे जो आपके मतलब की बात करे?
Of course आप दूसरा option choose करेंगे …हर एक इंसान पहले खुद को रखने में लगा हुआ है …मैं ऐसा हूँ, मुझे ये अच्छा लगता है, मैं ये करता हूँ ….isn’t it? पर आप इससे अलग करिए आप “I” से पहले “You” को रखिये.
आप कैसे हैं “, आपको क्या अच्छा लगता है?, आप क्या करते हैं ?
I bet, ऐसा करने से लोग आपको कहीं अधिक पसंद करेंगे. अगर अपनी बात करूँ तो अगर आप मुझसे AKC के बारे में बात करेंगे तो मैं आपको बहुत पसंद करूँगा.  
सिर्फ actors, cricketers, या writers ही नहीं एक आम आदमी भी audience चाहता है …जब आप एक आम आदमी के audience बनते हैं तो आप उसके लिए ख़ास हो जाते हैं. और जब आप बहुत से लोगों के साथ ऐसा करते हैं तो आप बहुत से लोगों के लिए ख़ास हो जाते हैं and in the process आप एक Person से बढ़कर एक Personality बन जाते हैं, एक ऐसी personality जिसे सभी पसंद करते हैं, जिसका charisma सभी को influence कर जाता है.

5. बोलने से पहले सुनिए:
इसे आप पॉइंट 4 का extension कह सकते हैं. जब आप दूसरे में interest लेते हैं तो इसमें ईमानदारी होनी चाहिए. आपने “आप क्या पसंद करते हैं?” इसलिए नहीं पूछा कि बस वो जल्दी से अपना जवाब ख़तम करे और आप अपनी राम-कथा सुनाने लग जाएं.
आपको सामने वाले को सिर्फ पहले बोलने का मौका ही नहीं देना है, बल्कि उसकी बात को ध्यान से सुनना भी है और बीच-बीच में उससे related और भी बातें करनी हैं. For ex: अगर कोई कहता है कि उसे घूमने का शौक है, तो आप उससे पूछ सकते हैं कि उसकी favourite tourist destination क्या है, और वहां पर कौन-कौन सी जगह अच्छी हैं.
अच्छे listeners की demand कभी कम नहीं होती आप एक अच्छा listener बनिए और देखिये कि किस तरह आपकी demand बढ़ जाती है.

6. क्या कहते हैं से भी ज़रूरी है कैसे कहते हैं :
आप जो बोलते हैं उससे भी अधिक महत्त्व रखता है कि आप कैसे बोलते हैं. For ex. आपसे कोई गलती हुई और आप मुंह बना कर sorry बोलते हैं तो उस sorry का कोई मतलब नहीं. हमें न सिर्फ सही words use करने हैं बल्कि उन्हें किस तरह से कहा जा रहा है इस बात का भी ध्यान रखना है.
इसलिए आप अपनी tone और body language पे ध्यान दीजिये, जितना हो सके polite और well-mannered तरीके से लोगों से बात करिए.
यहाँ मैं ये भी कहना चाहूँगा कि बहुत से लोग English बोलने की ability को Personality से relate कर के देखते हैं, जबकि ऐसा नहीं है, आप बिना A,B,C जाने भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले इंसान बन सकते हैं.

7. बिना अपना फायदा सोचे लोगों की help करिए :
कई बार हम ऐसी स्थिति में होते हैं कि दूसरों की help कर सकें, पर out of laziness या फिर ये सोचकर कि इसमें हमारा कोई फायदा नहीं है हम help नहीं करते. पर एक pleasant personality वाला व्यक्ति लोगों की help के लिए तैयार रहता है. हाँ, इसका ये मतलब नहीं है कि आप अपने ज़रूरी काम छोड़ कर बस लोगों की help ही करते रहे, लेकिन अगर थोडा वक़्त देने पर आप किसी के काम आ सकते हैं तो ज़रूर आएं. आपकी एक selfless help आपको दूसरों की ही नहीं अपनी नज़रों में भी उठा देगी और आप अच्छा feel करेंगे.
आपने सुना भी होगा-
A little bit of fragrance always clings to the hands that gives you roses.

8. अपने external appearance को अच्छा बनाइये :
चूँकि हमारा पहला impression हमारी appearance की वजह से ही बनता है इसलिए इस point पर थोडा ध्यान देने की ज़रुरत है.
Appearance से मेरा ये मतलब नहीं है कि आप Gym जाने लगिए और body बनाइये, या फिर beauty parlour के चक्कर लगाते रहिये, it simply means कि आप occasion के हिसाब से dress-up होइये और personal hygiene पर ध्यान द्जिये. छोटी–छोटी बातें जैसे कि आपका hair-cut, nails और polished shoe आपकी personality पर प्रभाव डालते हैं.

9. क्या appreciate कर सकते हैं खोजिये :
चाहे मैं हूँ, आप हों, या फिर Mr. Bachchan, तारीफ सुनना सबको पसंद है. लोगों का दिल जीतने का और अपना friend बनाने का ये एक शानदार formula है …प्रशंशा कीजिये, सच्ची प्रशंशा कीजिये.
India में ना जाने क्यों किसी की तारीफ़ करना इतना कठिन हो जाता है … शादियों में जो ऑर्केस्ट्रा होती है उसमे ज़रूर गए होंगे ….बेचारा गायक एक शानदार गीत गाता है है और तालियाँ बजाने की बजाये लोग एक -दूसरे के चेहरे देखने लगते हैं …; अच्छा हुआ मैं orchestra में नहीं गाता नहीं तो ऐसी audience की वजह से depression में चला जाता.  
खैर, मैं यहाँ individual level पे praise करने की बात कर रहा हूँ. अगर आप खोजेंगे तो हर इंसान में आपको तारीफ करने के लिए कुछ न कुछ दिख जाएगा; वो कुछ भी हो सकता है-उसका garden, coins का collection, बढियां से सजाया कमरा, उसकी smile, उसका नाम, कुछ भी, खोजिये तो सही आपको दिख ही जायेगा. और जब दिख जाए तो दब्बू बन कर मत बैठे रहिये, किसी की तारीफ़ करके आप उसे वो देंगे जो वो दिल से चाहता है …आप उसकी ख़ुशी को बढ़ा देंगे, उसका दिन बना देंगे, और सबसे बड़ी चीज आप उसे वो काम आगे भी carry करने के लिए fuel दे देंगे. अगर सामने बोलने से हिचकते हैं तो बाद में एक sms कर दीजिये, मेल से बता दीजिये, पर अगर कुछ praiseworthy है तो उसे praise ज़रूर करिए.
हाँ अगर बहुत कोशिश करने पर भी वो ना मिले तो don’t try to fake it…बच्चे भी समझ जाते हैं कि आप सच्ची तारीफ कर रहे हैं या झूठी.

10. लगातार observe और improve करते रहिये :
Personality development एक on-going process है. हम सब में improvement का infinite scope है, इसलिए कभी ये मत समझिये कि बस अब जिंतना improvement होना था हो गया, बल्कि अपने लिए कुछ समय निकाल कर अपनी activities, अपने words को minutely observe करिए, आपने क्या किया, आप उसे और अच्छा कैसे कर सकते हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि आप किसी चीज को लेकर खुद को तीस-मारखां समझ रहे हैं और हकीकत में लोग आपकी इस बात को पसंद नहीं करते.
For ex. कुछ साल पहले मैंने realize किया कि लोगों में जल्दी improvement लाने के चक्कर में मैं इतने अधिक mistakes point out कर देता कि उनका confidence कम हो जाता; so I improved on this point और अब मैं patiently ये काम करता हूँ. आप भी इस रास्ते पर बढ़ते हुए खुद को observe करते चलिए, और लगातार improve करते जाइये.

8. Time Management

समय का महत्व

आपके पास का हर एक क्षण खजाने के स्वरुप है, हमें उसका सदुपयोग करना चाहिये और किसी अच्छे के साथ बाटना चाहिये और उतना ही समय खर्च करना चाहिये जितने की जरुरत हो. और एक बात हमेशा याद रखनी चाहिये की- “समय किसी का इंतजार नहीं करता”.
1) एक हफ्ते का महत्व जानना हो तो, साप्ताहिक पत्रकार के Editor से पूछिए.
2) एक घंटे का महत्त्व जानना हो तो, उस प्रेमी से पूछिए जो मिलने के लिए इंतजार कर रहा हो.
3) एक मिनट का महत्त्व जानना हो तो, जिसकी ट्रेन छूटी है उस से पूछिए.
4) एक सेकंड का महत्त्व जानना हो तो, उस व्यक्ति से पूछिए जिसका Accident होते-होते रह गया.
5) एक मिलिसेकंड का महत्त्व जानना हो तो, उस व्यक्ति से पूछिए जिसने Olampics में सिल्वर मेडल जीता है.

टाईम मैनेजमेंट
बड़ा विचित्र लगता है जब हम Time के बारे में सोचते है, लेकीन जब हम समय को जीते है तब बहुत सरल-सा लगता है. पर समय से अधिक शक्तिशाली कोई भी नहीं और इसके उपर किसी का नियंत्रण नहीं होता अगर होता तो भगवान कृष्ण के होते हुये भी महाभारत क्यु होता ? और तो सुबह राज सिंहासन पर बैठने वाले भगवान श्रीराम उसी समय चौदह वर्ष के वनवास के लिये क्यों निकल पडे ? समय के कारण ही.
समय की गती एक समान होती है यह पहले से लेकर अंत तक एक ही गती से चलता रहता है. भगवान ने सभी को दिन के 24 घंटे दिये है. किसी को कम या ना किसी को ज्यादा फिर वो चाहे गरिब हो या अमीर. लेकीन अब इस 24 घंटे का उपयोग कौन किस तरह करता है ये उसपर निर्भर करता है. वैसे ही ‘ठिक समय पर किया हुआ थोडा-सा कार्य बहुत लाभदायक होता है और समय बीतने के बाद किया महान कार्य भी व्यर्थ हो जाता है’.
अगर आपको किसी काम के लिये कहा जाये तो आपका रवैया यह होना चाहिये की आप उसे समय पर करे. काम तो आप वैसे ही करेंगे हा पर समय पर करना बहुत महत्वपूर्ण है. क्योंकि वो काम आपके सर्वोच्च प्राथमिकता पर है. तो आइये, हम कुछ समय कुछ Time Management के साथ गुजरे और कुछ Time Management skills के Best Technique के बारे मै जाने.

काम का वितरण चार प्रकार में किया जा सकता है.
1) Important और Urgent वाले कार्य.
2) Important पर कम Urgent वाले कार्य.
3) Urgent पर कम Importantवाले कार्य.
4) कम Importantऔर कम Urgent वाले कार्य.

1) Urgent और Importantकाम
Urgent और Important काम जल्दी करने चाहिये. इसमे बहुत से काम हम समय नहीं करने के वजह से urgent और important बने होते है. जैसे इलेक्ट्रीक का बिल, Income Tax की तारिख इसकी योजना बनाकर हम तय करके ये काम हम दिये गये समय में पूरा कर सकते है. हमने अगर Rule के अनुसार कार्यक्रम लिख के नहीं रखा तो ये नंबर एक वाली लिस्ट बढ़ती ही जायेंगी. इस लिस्ट में कम से कम काम होने चाहिये इसका पूरी तरह से ध्यान रखना होगा.
Important और Urgent काम की लिस्ट छोटी होनी चाहिये.
अगर बड़ी समस्यामें change हुआ तो हम उसके बोझ के निचे दब सकते है. फिर वो काम पूरा करने के लिये ज्यादा मेहनत से काम में लगते है और वो काम खतम नहींहोता तो जल्द ही दूसरा नया काम सामने खड़ा हो जाता है.

2) Important लेकीन कम Urgent वाली काम
इस ग्रुप के काम Urgent नहीं होते लेकिन वी Important होते है. हमारे जीवन में क्या Important है. अगर ये पता होगा और हमें जीवन में क्या करना है इसकी निश्चित दिशा होंगी तो हम ये important और कम urgent काम करने में ज्यादा ध्यान देते है. इसमे के काम कभी कभी धयान न देने के वजह से Urgent हो सकते है.

3) Urgent लेकिन कम Important
ये काम हम पर आक्रमण करते रहते है. वो काम करने में लोग हमे मजबुर करते है. वो काम किये तो बाकी के लोगों को खुशीमिलती है. हम लोगों के लिये वो काम कर रहे होंगे तो लोकप्रिय होते है. वो काम हमारे सामने एकदम से खड़े होते है. लेकीन हमारे लिये वो कम Important होती है. Urgent और कम Important ये काम बहुत आसान होते है, वो काम करने के लिये हमें मजा आता है. जैसे – रास्ते पर हमें हमारे समाज का कोई इन्सान मिलता है, वही समाज की मिटींग के लिये आमंत्रण देता है. ये उसके लिये Important होता है लेकीन हमें Important नहीं होता.

4) कम urgent कम Important
एक दो घंटे हर रोझ पेपर पढ़ने में बिताना, T.V. पर सीरियल देखना चौक में बैठके दोस्तों के साथ गप्पे मारना, ये काम मतलब कम Urgent और कम Important होते है.
कम Important और कम Urgent काम करना मतलब ग्रुप चार के काम करना. उस वजह से बहुत से लोगों का 90% समय ये कम Urgent और Important काम करने ही जाता है.
हमारे जीवन में हमें क्या Important है ये अगर हमने तय कर लिया तोहम आसानी से खुशी से हसते रह सकते है, माफ़ी मांगे बिना ही हम कम Important काम के लिये इन्कार कर सकते है.
प्रभावी और सफल लोग ग्रुप तीन और चार के कामो से खुद को दुर रखते है क्योंकि वो काम urgent हो या ना हो वो important नहीं होती.


9. Interview

Interiew Tips
Interiew के दौरान आमतौर पर दो बातें ध्यान में रखी जाती हैं–
पहला, जिस फील्ड का Interiew आप देने आए हैं, उसके बारे में पूरा ज्ञान और दूसरी बात आपकी Body Language। बोले गए शब्द आपके कप्यूनिकेशन का केवल 8 प्रतिशत होते हैं। 37 प्रतिशत कम्यूनिकेशन आपके आवाज की टोन से होता है कि आप धीमा, तेज, प्रभावी किस आवाज में बोल रहे हैं। लेकिन 55 प्रतिशत कम्यूनिकेशन सिर्फ आपकी Body Language से होता है। बॉडी लैंग्वैज, ऎसा नानवर्बल कम्यूनिकेशन है, जो आपकी आदतों, स्वभाव और मन की स्थिति से पैदा होता है। Interiew क्लीयर करना कई बार कॉन्फिडेंस और प्रेजेंस ऑफ माइंड पर निर्भर करता है। इसके लिए Body Language महत्वपूर्ण कारक होता है। किसी व्यक्ति के भाव, विचार और आदत में अंतसंबंध होता है। तीनों ही एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। Body Language भी इन तीनों से मिलकर तैयार होती है। इसमें बदलाव से आपमें कॉन्फिडेंस का लेवल बढ सकता है। रोजगार के इस चैनल में इस बार हम आपके लिए लाए हैं,
________________________________________
Body Language के बारे में कुछ जानकारी
Interiew के दौरान आमतौर पर दो बातें ध्यान में रखी जाती हैं- पहला, जिस फील्ड का Interiew आप देने आए हैं, उसके बारे में पूरा ज्ञान और दूसरी बात आपकी Body Language। बोले गए शब्द आपके कप्यूनिकेशन का केवल 7 प्रतिशत होते हैं। अपने कंधों को आराम की मुद्रा में रखें। थोडा आगे की ओर झुककर बात करने वाला व्यक्ति साफ दिल-दिमाग का माना जाता है, लेकिन ज्यादा आगे की ओर झुके लोग चापलूस मालूम होते हैं। पैरे सीधे रखें, इसे क्रॉस नहीं रखें। क्रॉस पैर प्रतिरक्षात्मक संकेत देते हैं। इससे लगता है कि आपके मन में कुछ भय है या आप कुछ छुपाना चाहते हैं। आंखों में आंख डालकर बात करें। दूसरों की ओर देखने से लगता है कि आप उसकी बात को पूरा महत्व दे रहे हैं। बात के दौरान हामी भरें। इसके लिए बातों का दोहराव नहीं करते हुए गर्दन हिलाना बेहतर होता है।
हामी भरने के लिए बात का दोहराव करना शिष्टाचार में भी नहीं आता है। चेहरे पर अतिगंभीरता किसी को नहीं सुहाती है। हल्की-सी मुस्कान रखें। जरूरत पडने पर हंसें भी। खुश रहने के लिए होठों पर यूं ही मुस्कान चिपका लें, फिर देखिए आपकी तमाम मुश्किलें कैसे छूमंतर हो जाती हैं। अपना चेहरा छुएं नहीं। यह सामने वाले को डाइवर्ट करता है। साथ ही बताता है कि आप नर्वस हैं। किसी एक तरफ झुककर नहीं बैठें। सीधे बैठें, लेकिन आराम की मुद्रा में बैठें। अगर आप आगे की ओर झुके हैं, तो इससे पता चलता है कि आपको सामने वाले की बातों में रूचि है, वहीं पीछे की ओर ज्यादा झुके लोगों ओवरकॉन्फिडेंट लगते हैं।.
________________________________________
Interiew के दौरान Body Language
Interiew के दौरान आपकी योग्यता, व्यक्तित्व जैसे कई अहम पहलुओं को परखने की एक कसौटी आपकी Body Language यानी आपके हाव-भाव है।
आप कितने भी जानकार क्यों न हों लेकिन आपके उठने-बैठने का तरीका और हाव-भाव आपके कहे का समर्थन नहीं कर रहे तो Interiew निकालना आपके लिए मुश्किल हो सकता है, खासतौर पर तब जब Interiew के दौरान मनोचिकित्सक भी आपके पैनल में मौजूद हों।

आइए जानें, Interiew के दौरान आपको अपनी Body Language से जुड़ी किन बातों का ध्यान देना चाहिए जिससे खुद को प्रभावी ढंग से सामने रख सकें।

1. प्रवेश के साथ ही आपकी परीक्षा शुरू
Interiew के दौरान आपकी परीक्षा कमरे में प्रवेश करते ही शुरू हो जाती है। कमरे में घुसने के साथ आपके चेहरे पर मुस्कान और आत्मविश्वास झलकना चाहिए।
जाते ही कुर्सी पर बैठने के बजाय सामने वाले के इशारे का इंतजार करें। अगर टेबल के आस-पास कई कुर्सियां हैं तो वह जगह चुनें जहां आपके सामने बैठे व्यक्ति को आपसे बात करने के लिए कम से कम मुड़ना पड़े।

2. आप कैसे बैठते हैं
बैठने के दौरान अपने पॉश्चयर पर ध्यान दें। आपके शरीर की मुद्रा ऐसी होनी चाहिए जिससे आपका आत्मविश्वास और विनम्रता, दोनों का संतुलन दिखे। दोनों पैर जमीन पर रखकर सीधा बैठें। सामने टेबल है तो उसपर हाथ रख सकते हैं नहीं तो दोनों हाथों को अपनी गोद में रखें। अकड़कर बैठने के बजाय आगे की ओर हल्का झुकें।

3. पहले खुद आराम महसूस करें
परीक्षक के सामने बैठने का मतलब यह नहीं कि आप इतने सतर्क हो जाएं क‌ि आपका ध्यान सवालों के जवाब के बजाय अपने ऊपर ही हो। आप जिस मुद्रा में बैठें उसमें आराम महसूस करें। बहुत सिकुड़कर या झुककर बैठने से भी आपका व्यक्तित्व दबा लग सकता है।

4. हाथों पर दें ध्यान
Interiew के दौरान अपने विचार रखते वक्त या जवाब देते वक्त हाथों को बहुत अधिक हिलाकर बात न करें। अगर हाथ हिलाकर बात करना आपकी आदत में शुमार है तो इतना ध्यान रखें कि बात करते वक्त हाथ सीने से ऊपर न उठे। इससे आपका व्यवहार आक्रामक लग सकता है।
कुछ लोगों की आदत होती है टेबल पर पड़ी कमल या किसी चीज को हाथ में लेकर उससे खेलते रहना। Interiew के दौरान इस तरह की कोई गतिविधि न करें क्योंकि इससे आपकी एकाग्रता पर सवाल उठ सकते हैं।
और हां, हाथों को मोड़कर बैठने की कतई गलती न करें। आपकी कतई सुरक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है।

5. बात करते वक्त छोटी-छोटी बातें
परीक्षक से बात करते वक्त आंखों में आंखें डालकर बात करना सही तरीका है। इससे आपका आत्मविश्वास झलकता है।
Interiew के दौरान हर कोई थोड़ा बहुत नर्वस जरूर होता है। ऐसे में अपनी घबराहट को छिपाने के लिए बनावटी मुस्कान का कतई सहारा न लें। हल्की घबराहट तो बातचीत के दौरान अपनेआप दूर हो जाती है। चेहरे पर सामान्य मुस्कान जरूर रखें। हां, बेवजह हंसने-हंसाने की जरूरत नहीं है।
Interiew के दौरान अगर परीक्षक आपको पानी या चाय ऑफर करता है तो इसे सामान्य रूप से लें। अगर आपको प्यास लगी है तो पानी पीकर सामान्य होना समझदारी है न कि प्यासा रहकर बेचैन रहना। लेकिन आप यह भी ध्यान रखें कि आप घबराहट में जल्दी-जल्दी पानी पीते हैं तो यह भी सामान्य नहीं है।
Interiew के दौरान बार-बार बालों पर हाथ फेरना, कपड़े ठीक करना आदि छोटी-छोटी बातें आपकी घबराहट सामने रख देती हैं।
बातचीत के दौरान आप जो नहीं हैं, वह बनने का प्रयास करना निरर्थक है। आप जो हैं, उसे संवारकर पेश करना ही समझदारी है।

10. Success Formula

सफलता के सूत्

दोस्तों जीवन (Life) में हमारे पास अपने लिए मात्र 3500 दिन (9 वर्ष व 6 महीने) ही होते है !

वर्ल्ड बैंक ने एक इन्सान की औसत आयु 78 वर्ष मानकर यह आकलन किया है जिसके अनुसार हमारे पास अपने लिए मात्र 9 वर्ष व 6 महीने ही होते है | इस आकलन के अनुसार औसतन 29 वर्ष सोने में, 3-4 वर्ष शिक्षा में, 10-12 वर्ष रोजगार में, 9-10 वर्ष मनोरंजन में, 15-18 वर्ष अन्य रोजमरा के कामों में जैसे खाना पीना, यात्रा, नित्य कर्म, घर के काम इत्यादि में खर्च हो जाते है | इस तरह हमारे पास अपने सपनों (Dreams) को पूरा करने व कुछ कर दिखाने के लिए मात्र 3500 दिन अथवा 84,000 घंटे ही होते है |
1- बिना योजना (Planning) बनाये कोई भी कार्य (Work) मत कीजिए। याद रखिए कि एक अच्छी योजना (Good planning) आपकी सफलता की गारंटी (Success guarantee) को बढ़ा देती है। प्रत्येक कार्य के लिए एक योजना (Plan) जरूर बनाइये।
2- अच्छी घटनाओं (Good events) को हमेशा याद रखिये और बुरी घटनाओं (Bad events) को हमेशा के लिए भूल (Forget) जाइये। बुरी घटनाओं को याद रखने से Life में नुकसान के अलावा फायदा कुछ भी नहीं है। इन दोनों योग्यताओं (Abilities) (क्या याद रखना है? और क्या भूल जाना है?) को हमेशा बढ़ाते रहें।
3- अपनी कल्पना शक्ति (Imaginations) को अधिक से अधिक मजबूत (Strong) बनाइये। हमेशा सफल होने की कल्पना (Imagine) कीजिए। आपकी कल्पना शक्ति (Imagine power) जितनी मजबूत होगी, सफलता आपके उतनी ही करीब आयेगी।
4- “I am the Best”, “I am the Winner”, “I will be a Successful person” आदि शब्दों को रोज सुबह और शाम (Every morning and evening) बार-बार दोहराइए और इससे होने वाले जादू (Magic) को अपने जीवन में महसूस कीजिए।
5- अपनी सोच हमेशा सकारात्मक (Think Positive) रखिये। सकारात्मक सोच (Positive Thinking) से बड़े से बड़े लक्ष्यों (Target) को आसानी से पाया जा सकता है।
6- जब भी बोलें या किसी से भी बोलें, हमेशा सकारात्मक शब्दों (Positive Words) का प्रयोग कीजिए। सकारात्मक शब्दों का जादू (The magic of Positive Words) हर किसी को मंत्रमुग्ध (Charmed) कर देता है। आपका हर जगह स्वागत (Welcome) होगा।

________________________________________
“संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु समय ही है”
लेकिन वर्तमान में ज्यादातर लोग निराशामय जिंदगी (Life) जी रहे है और वे इंतजार कर रहे होते है कि उनके जीवन में कोई चमत्कार होगा, जो उनकी निराशामय जिंदगी को बदल देगा| दोस्तों वह चमत्कार आज व अभी से शुरू होगा और उस चमत्कार को करने वाले व्यक्ति आप ही है, क्योंकि उस चमत्कार को आप के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं कर सकता | इस शुरुआत के लिए हमें अपनी सोच व मान्यताओ (beliefs) को बदलना होगा |
________________________________________
जीवन के नियम :-
दोस्तों हम एक नयी शुरुआत करने जा रहे है और इसके लिए हमें कुछ नियमो का पालन करना होगा | ये नियम आपकी जिंदगी बदल देंगे |

1. स्वतंत्रता (Independence):-
स्वतंत्रता का अर्थ स्वतन्त्र सोच एंव आत्मनिर्भरता से हैं |
“हमारी खुशियों का सबसे बड़ा दुश्मन निर्भरता (Dependency) ही है एंव वर्तमान में खुशियाँ कम होने का कारण निर्भरता का बढ़ना ही है”
“सबसे बड़ा यही रोग क्या कहेंगे लोग”:-ज्यादातर लोग कोई भी कार्य करने से पहले कई बार यह सोचते है की वह कार्य करने से लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे या क्या कहेंगे और इसलिए वे कोई निर्णय ले ही नहीं पाते एंव सोचते ही रह जाते है एंव समय उनके हाथ से पानी की तरह निकल जाता है | ऐसे लोग बाद में पछताते हैं| इसलिए दोस्तों ज्यादा मत सोचिये जो आपको सही लगे वह कीजिये क्योंकि शायद ही कोई ऐसा कार्य होगा जो सभी लोगों को एक साथ पसंद आये |
अपनी ख़ुशी को खुद नियंत्रण (control) कीजिये:-वर्तमान में ज्यादातर लोगों की खुशियाँ (Happiness) परिस्थितियों पर निर्भर हैं| ऐसे लोग अनुकूल परिस्थिति में खुश (Happy) एंव प्रतिकूल परिस्थियों में दुखी (Sad) हो जाते है | उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति का कोई काम बन जाता है तो वह खुश (Happy) एंव काम न बनने पर वह दुखी हो जाता है | दोस्तों हर परिस्थिति में खुश रहें क्योंकि प्रयास करना हमारे हाथ में है लेकिन परिणाम अथवा परिस्थिति हमारे हाथ में नहीं है | परिस्थिति अनुकूल या प्रतिकूल कैसी भी हो सकती है लेकिन उसका response अच्छा ही होना चाहिए क्योंकि response करना हमारे हाथ में है |
आत्मनिर्भर बनें:-दोस्तों निर्भरता ही खुशियों की दुशमन है इसलिए जहाँ तक हो सके दूसरों से अपेक्षाओं कम करें, अपना कार्य स्वंय करें एंव स्वालंबन अपनाएं दूसरों के कर्मों या विचारों से दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि दूसरों के विचार या हमारे नियंत्रण में नहीं है |
“अगर आप उस बातों या परिस्थियों की वजह से दुखी हो जाते है जो आपके नियंत्रण में नहीं है तो इसका परिणाम समय की बर्बादी व भविष्य पछतावा है”
________________________________________
2. वर्तमान में जिएं (Live in Present):-
दोस्तों हमें दिन में 70,000 से 90,000 विचार (thoughts) आते है और हमारी सफलता एंव असफलता इसी विचारों की quality (गुणवता) पर निर्भर करती हैं| वैज्ञानिकों के अनुसार ज्यादातर लोगों का 70% से 90% तक समय भूतकाल, भविष्यकाल एंव व्यर्थ की बातें सोचने में चला जाता है | भूतकाल हमें अनुभव देता है एंव भविष्यकाल के लिए हमें planning (योजना) करनी होती है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं की हम अपना सारा समय इसी में खर्च कर दें| दोस्तों हमें वर्तमान में ही रहना चाहिए और इसे best बनाना चाहिए क्योंकि न तो भूतकाल एंव न ही भविष्यकाल पर हमारा नियंत्रण है |
“अगर खुश रहना है एंव सफल होना है तो उस बारे में सोचना बंद कर दें जिस पर हमारा नियंत्रण न हो”
________________________________________
3. मेहनत एंव लगन (Hard work and Focus ):-
दोस्तों किसी विद्वान् ने कहा है की कामयाबी, मेहनत से पहले केवल शब्दकोष में ही मिल सकती है | मेहनत (Hard Work) का अर्थ केवल शारीरिक काम से नहीं है, मेहनत शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार से हो सकती है | अनुभव यह कहता है की मानसिक मेहनत, शारीरिक मेहनत से ज्यादा मूल्यवान होती है |
कुछ लोग लक्ष्य (Target) तो बहुत बड़ा बना देते है लेकिन मेहनत नहीं करते और फिर अपने अपने लक्ष्य को बदलते रहते है | ऐसे लोग केवल योजना(planning) बनाते रह जाते है |
मेहनत व लगन से बड़े से बड़ा मुश्किल कार्य आसान हो जाता है | अगर लक्ष्य को प्राप्त करना है तो बीच में आने वाली बाधाओं को पार करना होगा, मेहनत करनी होगी, बार बार दृढ़ निश्चय से कोशिश करनी होगी |
“असफल लोगों के पास बचने का एकमात्र साधन यह होता है कि वे मुसीबत आने पर अपने लक्ष्य को बदल देते है |”
कुछ लोग ऐसे होते है जो मेहनत तो करते है लेकिन एक बार विफल होने पर निराश होकर कार्य को बीच में ही छोड़ देते है इसलिए मेहनत के साथ साथ लगन व दृढ़ निश्चय (Commitment) का होना भी अति आवश्यक है |
“अगर कोई व्यक्ति बार बार उस कार्य को करने पर भी सफल नहीं हो पा रहा तो इसका मतलब उसका कार्य करने का तरीका गलत है एंव उसे मानसिक मेहनत करने की आवश्यकता है |”
________________________________________
4. व्यवहारकुशलता:-
व्यवहारकुशल व्यक्ति जहाँ भी जाए वह वहां के वातावरण को खुशियों से भर देता है ऐसे लोगों को समाज सम्मान की दृष्टी से देखा जाता है | ऐसे लोग नम्रता व मुस्कराहट (Smile) के साथ व्यवहार करते है एंव हमेशा मदद करने के लिए तैयार रहते है | शिष्टाचार ही सबसे उत्तम सुन्दरता है जिसके बिना व्यक्ति केवल स्वयं तक सीमित हो जाता है एंव समाज उसे “स्वार्थी” नाम का अवार्ड देता है |
“जब आपके मित्रों की संख्या बढने लगे तो यह समझ लीजिये कि आप ने व्यवहारकुशलता का जादू सीख लिया है |”
शिष्टाचारी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र भी जाए वहा उनके मित्र बन जाते है जो उसके लिए जरुरत पड़ने पर मर मिटने के लिए तैयार रहते है |
चरित्रव्यवहारकुशलता की नींव है एंव चरित्रहीन व्यक्ति कभी भी शिष्टाचारी नहीं बन सकता| चरित्र, व्यक्ति की परछाई होती है एंव समाज में व्यक्ति को चहरे से नहीं बल्कि चरित्र से पहचाना जाता है | चरित्र का निर्माण नैतिक मूल्यों, संस्कारों, शिक्षा एंव आदतों से होता है |
व्यवहारकुशल व्यक्तियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है की वह हमेशा मदद के लिए तैयार रहते है |
वर्तालाप दक्षता, व्यवहारकुशलता का महत्वपूर्ण हिस्सा है | वाणी में वह शक्ति है जो वातावरण में मिठास घोल कर उसे खुशियों से भर सकती है या उसमे चिंगारी लगा कर आग भड़का सकती है |
“words can change the world” (शब्द संसार बदल सकते है |)
सोच समझ कर बोलना, कम शब्दों में ज्यादा बात कहना, व्यर्थ की बातें न करना, अच्छाई खोजना, तारीफ़ करना, दुसरे की बात को सुनना एंव महत्त्व देना, विनम्र रहना, गलतियाँ स्वीकारना इत्यादि वार्तालाप के कुछ basic नियम है |

11. Self Improvement

व्यक्तित्व विकास और स्वयं में सुधार लाने के तरीके
(Personality Development And Self Improvement Tips In Hindi)

अब मैं आपको ऐसे तरीकों को बताऊंगा जिन्हें अपनाकर आप अपना व्यक्तिगत विकास और आत्म विकास भी कर सकते है और लोगों को भी Impress कर सकते हैं। आप इन Great Tips को अपनी Life में प्रयोग कीजिये और एक आकर्षक व्यक्तित्व(Charming personality) के मालिक बन जाइये।

मुस्कुराते चेहरे के साथ लोगों से मिलें (Smiling Face)
जब भी लोगों से मिलें, उस समय आपके चेहरे (Face) पर मुस्कुराहट (Smile) होनी चाहिए। दिन में हम बहुत से लोगों से मिलते हैं और बात करते हैं। हर किसी को मुस्कुराता हुआ चेहरा (Smiling Face) पसंद होता है और मुस्कुराता हुआ चेहरा हर किसी को प्रभावित (Impress) भी करता है। मुस्कुराते हुए चेहरे में ऐसा जादू (Magic) होता है कि लोग इससे Impress हो जाते हैं। अतः हमेशा मुस्कुराते रहें (Keep smiling), लोग आपसे Impress जरूर होंगे।

कपड़े पहनने का सही तरीका अपनायें (Right Dressing Sense)
कपड़े तो सभी लोग पहनते हैं लेकिन कपड़े पहनने का सही तरीका सभी को नहीं आता। यदि तरीके से कपड़े पहनें जाएं तो पुराने कपड़े भी Handsome Look देते हैं। आप ऐसे कपड़े पहनें जो आप पर अच्छे लगते हों। इसके लिए आप ऐसे कपड़े पहन सकते हैं जो दूसरों को पसंद हो। आपका Good dressing sense लोगों को बहुत पसंद आएगा और लोग आपसे Impress हुए बिना नहीं रह पाएंगे।

प्रत्येक कार्य समय पर करें (Each Work On Time)
एक सफल व्यक्ति (Successful person) की पहचान यह होती है कि वह समय का पाबंद (Punctual) होता है। ऐसा व्यक्ति सभी कार्य समय (All work in time) पर शुरू करता है और समय पर ही पूरा करता है। लोग ऐसे व्यक्ति से बहुत Impress होते हैं। सभी जानते हैं कि समय ही धन है (Time is Money.)। पैसा वही कमा सकता है जो समय की इज्जत करता हो और जो समय की इज्जत करता है, दुनिया उसकी इज्जत (Respect) करती है।

अपने सभी काम अप टू डेट रखें (Keep up to date all work)
घर का कोई काम हो या ऑफिस का कोई काम हो, सभी को अप टू डेट रखिए। अपने सभी कार्य एक सुनियोजित तरीके (Planning) से कीजिये जिससे कोई भी कार्य अधूरा (Incomplete) न रह जाये और Time पर पूरा हो जाये। एक डायरी बनाइये (Make a diary) और उसमे अपने कार्यों की एक लिस्ट तैयार कीजिये। अगर आप अपने काम में अप टू डेट रहेंगे तो लोग आपसे Impress होंगे और आप दूसरों के लिए एक मिशाल (Example) बन जायेंगे।

प्रभावपूर्ण शब्दों का प्रयोग करें (Use Positive Words)
जब भी किसी से बात करें तो बात करते समय ऐसे शब्दों का Use करें जो Impressive हों। ऐसे शब्द बोलिए जो दूसरों को अच्छे लगें, ऐसे शब्द बोलिए जो लोगों के दिल में उतर जाएं तो लोग आपसे Impress हुए बिना रह नहीं पाएंगे। आपके ऐसे शब्द लोगों को अपना बना लेंगे। इसके अतिरिक्त, यदि किसी का विरोध भी करना हो तो भी ऐसे शब्दों का Use करें जिससे काम भी बन जाये और सुनने वाले को बुरा भी न लगे।

अपने काम की पूरी जानकारी रखें (Full Knowledge Of Your Work)
आप चाहे कोई भी Job कर रहे हों या कोई भी Business कर रहें हो, आपको उसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए। मान लीजिये आपने मेडिकल स्टोर खोला और यदि आपको मेडिसिन के बारे में जानकारी ही न हो या आधी अधूरी जानकारी हो तो आप उस काम में सफल नहीं हो पाएंगे। पहले कार्य की Full Knowledge लें फिर कार्य शुरू करें तो आप कार्य में सफल भी होंगे और लोग भी आपकी Knowledge को देखकर बिना Impress हुए नहीं रह पाएंगे।

जो कह दो, वह जरूर करो (Words And Actions Should Be Similar)
जब भी किसी से कोई कार्य करने के लिए कहें तो उसे जरूर करें और अगर नहीं कर सकते तो करने को कहें ही नहीं। अर्थात आपकी कथनी और करनी (Words And Actions) में कम से कम अंतर हो। यदि आप जो कहते हैं और अगर वह आप न करें तो लोगों को आप पर विश्वास (Believe) नहीं रहेगा। यदि आप जो काम करने के लिए कह दें और उसे पूरा भी करें तो लोग आपकी बातों पर विश्वास करेंगे और आपकी इसी अच्छी आदत (Good habit) से लोग Impress भी होंगे।

किसी की बुराई या आलोचना मत कीजिए (Do Not Criticize Anyone)
आपने अपनी लाइफ में बहुत बार यह पढ़ा या सुना होगा कि किसी की आलोचना या बुराई नहीं करनी चाहिए। क्योकि ऐसा करने से आप लोगों का विश्वास खो देते हैं और लोगों के लिए आपकी Negative image बन जाती है। एक बात यह भी है कि आलोचना या बुराई करने के नुकसान बहुत हैं लेकिन फायदा एक भी नहीं है। अतः यदि आप ऐसा करने से बचते हैं तो लोगों में आपकी Positive image बनेगी और आप लोगों को Impress कर पाएंगे।

दूसरों की सहायता करना सीखिये (Help Others)
आपको Helpful बनना चाहिए और लोगों की Help जरूर करनी चाहिए। Helpful Nature के व्यक्ति को सभी पसंद करते हैं। आपके द्वारा की गई एक छोटी सी मदद आपको भविष्य में बहुत फायदा पहुंचा सकती है क्योकि जिसकी आप Help करेंगे, वह आपको हमेशा याद रखेगा और समय आने पर वह भी आपकी हेल्प जरूर करेगा। अतः लोगों की Help जरूर करें तो लोग आपसे Impress जरूर होंगे। इसके लिए आप यह पोस्ट पढ़ सकते हैं

अपनी सफलता का श्रेय दूसरों को भी दीजिये (Attributes His Success To Others)
जब भी हम कोई सफलता प्राप्त करते हैं तो उस सफलता के हकदार वह लोग भी होते हैं जिन्होंने आपकी सफलता प्राप्त करने में मदद की हो। याद रखिये, सफलता अकेले एक बंद कमरे में प्राप्त नहीं होती, उसके लिए आप बहुत से लोगों से Direct और Indirect रूप से Help जरूर लेते हैं। तो आप जब भी कोई सफलता प्राप्त करें तो उसका श्रेय (Credit) उन लोगों को भी दें जिन्होंने आपकी Help की हो। ऐसा करने से आप उन लोगों को Impress कर सकते हैं।

दूसरों की सच्ची तारीफ जरूर कीजिये (True Appreciation Of Others)
यदि कोई व्यक्ति कोई अच्छा काम करता है तो उसकी तारीफ जरूर करें। अपनी तारीफ हर किसी को पसंद होती है और जब आप किसी की तारीफ करेंगे तो वह आपकी इस आदत की वजह से impress जरूर होगा। लेकिन एक बात ध्यान रखें किसी की तारीफ तभी करें जब वह इस काबिल हो। यदि बिना किसी वजह के आप किसी की तारीफ करेंगे तो यह चापलूसी कहलाएगी। अतः लोगों की सच्ची तारीफ करें।

अपने काम करने का तरीका बदल दीजिये (Change Your Working Style)
लोग आपसे Impress तभी होंगे जब आप अपने काम को प्रभावपूर्ण तरीके (Impressive way) से करेंगे। अपने चलने का तरीका, उठने और बैठने का तरीका, काम करने का तरीका अर्थात अपने प्रत्येक कार्य करने का तरीका Impressive बना लीजिए। यह ध्यान रखिये कि सफल लोग कार्य तो वही करते हैं जो सभी करते हैं लेकिन उनका कार्य करने का तरीका अलग होता है।

12. Attitude

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो कहते हैं कि I CAN”T और दूसरे वे जो I CAN के सिद्धांत को मानते हैं। I CAN का सिद्धांत मानने वालों के लिए किसी भी चैलेंज को स्वीकार करना या लाइफ में रिस्क लेना मुश्किल नहीं होता है, और वही लोग जीवन में सफलता की बुलंदियों को छू पाते हैं। हमें अपनी सोच या attitude हमेशा सकारात्मक रखनी चाहिए।

कई बार हम सोच या नजरिये की बात करते हैं, हम सबने अपनी सोच की शक्ति के बारे में सुना है, और ये हमारी सोच ही है, जो हमारी सफल होने की संभावना को निर्धारित करती है। हम जानते हैं कि सकारात्मक सोच जीवन के कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जबकि नकारात्मक सोच स्वयं ही हमारे जीवन को तबाह कर देती है। आमतौर पर सकारात्मक सोच हमें हमेशा खुश रखती है, और सफलता की ओर ले जाती है। जबकि नकारात्मक सोच हमें दुखी, उदास, तनावपूर्ण, और जीवन से छुटकारा पाने के विचार की ओर ले जाती है। इसलिए अच्छी और रचनात्मक सोच सफलता और उपलब्धियों के लिए बहुत जरूरी है।

हम कैसे ऐसी आदतें विकसित करें, जो हमारी सोच को सकारात्मक बनाने में मदद करे?

सबसे पहले आइये जानते हैं कि, सोच या attitude क्या होता है।

सोच क्या है?

मनोविज्ञान में सोच या नजरिया या रवैया किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना के पक्ष या विपक्ष में भावना की अभिव्यक्ति है।

दूसरे शब्दों में, सोच किसी व्यक्ति या वस्तु के बारे में सोचने या विचार करने का एक स्थाई तरीका है।
Positive attitude- सकारात्मक विचार, सकारात्मक भावना, और सकारात्मक अभिव्यक्ति होती है।
Negative attitude- नकारात्मक विचार, नकारात्मक भावना और नकारात्मक अभिव्यक्ति होती है।
Sakaratmak Soch (Positive Thinking)
जब भी खिड़की से बाहर देखें तो कीचड़ को नहीं, आसमान के तारों को देखें—यही है सकारात्मक सोच। सकारात्मक सोच आदमी का वह ब्रह्मास्‍‍त्र है, जो उसके मार्ग के सभी व्यवधानों व बाधाओं को समाप्‍त कर उसकी सफलता का मार्ग प्रशस्त कर देता है। याद रखें—एक नकारात्मक विचार हमारे अनेक सकारात्मक विचारों को समाप्‍त कर देता है, उनका दमन कर देता है। निराशा मनुष्य को शिथिल कर देती है, तोड़कर रख देती है; वहीं एक छोटी सी सफलता का सकारात्मक विचार मन में उमंग एवं उत्साह का संचार कर देता है।
आज की आपाधापी भरी जिंदगी में सभी लोग तरह-तरह की स्पर्धाओं और चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में महत्त्वपूर्ण आवश्यकता सकारात्मक दृष्‍टिकोण तथा सोच के साथ आगे बढ़ने की है। सकारात्मक सोच व्यक्‍ति की जीवनशैली और फिर दृष्‍टिकोण को बदल देती है; इससे व्यक्‍ति की सफलता के सारे द्वार खुल जाते हैं।
कैसे पाएं सकारात्मक सोच :-
आइये नीचे हम आपको कुछ ऐसी आदतों के बारे में बताते हैं, जो आपको अपनी सोच को सकारात्मक बनाने में मदद कर सकती है।
1.अहसानों (greatfullness) की एक डायरी बनाएं :
कोई एक बुरी घटना एक क्षण में आपका पूरा दिन खराब कर सकती है, या किसी के साथ कोई झगड़ा या बहस हमारी खुशियों को उस दिन कम देता है। जब भी आपको लगे कि आपके मन में नकारात्मक भावनाएं आपको परेशान कर रही हैं तो इन्हे नियंत्रित करने के लिए एक डायरी में उस दिन की 5 ऐसी बातों या घटनाओं को लिख डालिये जब आपने कृतज्ञता या अहसानमंद होने की भावना महससू करी, और आप देखेंगे कि कैसे आपका नजरिया बदल जाता है। ये देखा गया है कि प्रशंसा से आप खुश होते हैं और चिंता, नकारात्मकता और तनाव की भावनाएं आपके पास नहीं आने पाती।
2.अपनी चुनौतियों का सामना नए तरीके से करें:
हमे अपनी पुरानी सोच कि, ये काम बहुत कठिन है यह नही हो सकता। .....इन बातों के स्थान पर, यह हो जायगा, ये मैं कर सकता हूँ जैसी भावना लाएं। हो सकता है ऐसी बहुत सी चीजे हों जिन पर हमारा पूरा नियंत्रण ना हो लेकिन यदि हम अपनी पूरी सामर्थ्य और मन को उस काम करने में लगाते हैं तो हमें बाद में कोई पछतावा नही रहता। चुनौतियों का सामना साहस के साथ करो ना कि विकास के अनुभव में रुकावट की तरह ।
3.REJECT होने पर भी अच्छा महसूस करें:
रिजेक्शन एक कला है, जिससे हमें अपनी असफलताओं को समझने और कमियों को सुधारने का मौका मिलता है, क्योंकि जीवन में कोई भी बिना रिजेक्शन के आगे नही बढ़ता है। इसलिए reject होने पर परेशान ना हों और बुरा होने की आशा कभी मत करें। यदि बुरा होने का इंतजार करेंगे, तो बुरा होने की संभावना होती है। इसलिए हमेशा ये सोच रखिये कि reject हो गया तो क्या हुआ, मैं स्वयं की कमियों का सुधार करूंगा, सबठीक है, और मेरे पास अगला मौका है।
4.अपने जीवन का वर्णन सकारात्मक शब्दों से करें:
हमारी सोच से ज्यादा प्रभावी हमारे शब्द होते हैं। आप वो हैं जो आप अपने बारे में सोचते हैं। आप अपने जीवन के बारे में जो बोलते हैं, वैसा ही आपका जीवन होता है। जो भी आप बोलते हैं आपका दिमाग वही सुनता है। इसलिए हमेशा अपने लिए अच्छे, सरल और सुंदर शब्दों का प्रयोग करें आप देखेंगे आपका जीवन एक अलग तरह के प्रकाश से चमक उठेगा। आपने अपने जीवन के लिए जो मार्ग चुना है उसमे आपको अधिक आनंद मिलेगा। हमेशा अपने शब्दों में सकरात्मक रहें। उदाहरण के लिए जब भी सम्भव हो अपने आप से कहें-मैं सम्पूर्ण हूँ मैं खुश हूँऔर मैं सकारात्मक हूँ 
5.Negative  या प्रश्नवाचक शब्दों को सकारात्मक शब्दों से बदलिये:
हम अक्सर नकारात्मक या प्रश्नवाचक शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे -मुझे यह काम करना है, पानी का गिलास आधा खाली है, आदि-आदि। इसके बदले में  सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करें। जैसे मुझे यह कार्य करने का अवसर मिला, पानी का ग्लास आधा भरा हुआ है।  आपका रवैया आपके कामों को पूरा करने, उसमें प्रशंसा पाने में तेजी से बदलाव लाता है, और हम वैसा पाते हैं जैसा हम चाहते हैं।
6.कोशिश करें कि अपने आपको, दूसरों की शिकायतों में घसीटने का मौका न दें:-
आपका दिन बहुत अच्छा जा रहा है, और आप बहुत अच्छा काम कर रहे है और आपके सहयोगी इस शानदार माहौल पर पकड़ ढीली नहीं करना चाहते हैं। आपको पता भी नहीं चलेगा और अचानक  वह आपको शिकायत के उत्सव में शामिल कर लेंगे। एक महीने के अंदर आपको बड़ी चतुराई के साथ इस बेहद गर्म विरोध प्रदर्शन में शामिल कर लिया जायेगा। कोशिश करें कि आप इस तरह के जाल में न फंसे। Warsaw School of Social Psychology  का एक अध्ययन यह दिखाता है, कि नकारात्मक मन और भावनाएं आपके जरूरतों की पूर्ति, आपके आदर्श, और आपकी सकारात्मक भावनाओं में कमी लाती हैं।
7.सकारात्मकता लाने में सांसों का इस्तेमाल करें :-
हमारी साँस विशेष रूप से हमारी भावनाओं से जुडी हुई है। क्या आपने गौर किया है कि जब हम किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो अपनी सांसो को रोक कर रखते हैं?और क्या अपने महसूस किया है कि, जब हम क्रोध करते हैं, तो हमारी साँस बदल जाती है। हमारी साँस हमारी भावनाओं के अनुसार बदल जाती है। इसी प्रकार अपनी सांसो का इस्तेमाल करके अपनी सोच का तरीका भी बदल सकते हैं।  जब भी आप फ्री हों-दस बार लम्बी और गहरी साँस लीजिये। आपको अच्छा लगेगा।
8.बुरे समय (आपदा) में भी सच्ची बातों पर ध्यान दीजिये:
जब मीडिया में चारो तरफ नफरत और क्रूरता फैली हो तब विश्वास और सकारात्मक बातें सोचना बहुत कठिन होता है। आपदा, युद्ध, और दर्दनाक अनुभव की घटनाओं में झूठी संवेदना और अपनापन दिखाने वाली खबरों की बजाय हमें सच्ची खबरों को देखना सीखना होगा।
9.किसी समस्या के साथ उसका समाधान भी खोजिए:
सकारात्मक रहने का मतलब ये नहीं कि आप समस्याओं के प्रति जागरूक ही ना हों। रचनात्मक व्यक्ति के पास किसी भी समस्या को सुलझाने का हल होता है। जब आप अपने आस -पास की किसी समस्या को उठायें तो उसके समाधान का प्रस्ताव पर भी आपका प्रयास होना चाहिए। समस्या आने पर उससे परेशान होने की बजाय ये समस्या किस प्रकार हल हो सकती है, इसका प्रयास कीजिये।
10.किसी को ख़ुशी दीजिये:
क्या अपने कभी किसी गरीब या बेसहारा व्यक्ति की मदद की है, या उनके बारे सोचा है? हममे से अधिकांश उन्हें देखकर बुरा सोचते है। हमें अपनी समाज के प्रति जिम्मेदारी को समझना चाहिए। प्रति दिन किसी एक व्यक्ति को थोड़ी ख़ुशी देने का उद्देश्य बनाइये, और देखिये इससे आपको कितनी ख़ुशी मिलेगी। इससे आपको आस-पास रहने वाले सामान्य लोगों के प्रति आपकी बुरी मानसिकता को बदलने में मदद मिलेगी।

रुख, रवैया अंग्रेजी में जिसे ऐटिट्यूड कहा जाता है। आखिर है क्या यह ऐटिट्यूड? अक्सर ऐटिट्यूड को नकारात्मक अंदाज में ही देखा जाता है। मसलन अगर कोई अकड़ू है, ‍कम बात करता है या सिर्फ अपने काम से ही मतलब रखता है तो लोग कहते हैं कि उसमें ऐटिट्यूड है। सही मायने में ऐसा नहीं है, अगर डिक्शनरी में ऐटिट्यूड की परिभाषा देखें तो हम पाएंगे कि जिंदगी के प्रति देखने का एक जरिया है ऐटिट्यूड। सोचने, समझने और बर्ताव करने का तरीका है ऐटिट्यूड।   

अच्छे-बुरे के आधार पर ही ऐटिट्यूड दो तरह का होता है सकारात्मक और नकारात्मक। अत: ऐटिट्यूड को सिर्फ नकारात्मकता के लिए समझना सही नहीं है।   
किसी भी काम की सफलता के पीछे हमारी सोच, उस काम के प्रति हमारे रवैये पर ही निर्भर करती है। या यूं कहें कि हमारे ऐटिट्यूड पर ही निर्भर करती है। हम उस काम को किस नजरिए से देखते हैं यही बात हमारी सफलता-असफलता का कारण होती है। ठीक इसी तरह अपने अच्छे करियर के लिए जरूरी है कि हम उसकी शुरुआत के समय उसके प्रति अपने रुख को निर्धारित करें।  


सिर्फ अपना करियर प्लान कर लेना ही सब-कुछ नहीं है। ‍करियर प्लान के साथ अगर हम उसके प्रति अपने सकारात्मक रवैये को नहीं अपनाते हैं तब यह गलती हमारे ‍करियर प्लान को क्षीण बना देगी और हम अपने लक्ष्य तकनहीं पहुंच पाएंगे। किसी भी करियर में सफलता अर्जित करने के लिए जरूरी है कि हम उसके प्रति सकारात्मक रुख के महत्व को समझें।  
अपने काम के लिए आप ऐटिट्यूड के रूप में अपने आदर्शों को निर्धारित कर सकते हैं जो लक्ष्य पाने के लिए हमेशा आपका मार्गदर्शन करते रहें। आप नीचे दिए तीन आदर्शों को करियर के प्रति अपने ऐटिट्यूड के रूप में निर्धारित कर सकते हैं। 

1. गर्व (प्राइड) 
हालांकि यह एक बड़ा ह‍ी जटिल शब्द है, लेकिन इसे अहंकार के रूप में न लेते हुए अपने आत्म सम्मान के रूप में लिया जाना चाहिए। तभी आप अपने काम को नाज करने लायक बनापाएंगे। वैसे भी गर्व और घमंड के बीच बहुत महीन पर्त है। 

2 उत्साह (पैशन) 
किसी भी करियर को महज थोड़ी सी इच्छा के कारण स्वीकारना अक्लमंदी का काम नहीं है। ऐसा करने से आगे मुश्किल दौर में आप उस करियर मेंअपने आप को साबित नहीं कर पाएंगे और न ही आपकी पदोन्नति हो पाएंगी। करियर में आगे और आगे जाने के लिए जरूरी है उसके प्रति प्रबल इच्छा, रूचि। अपने काम के प्रति आपकी दीवानगी, आपका पैशन ही आपको उस क्षेत्रमें असीम सफलता दिला सकता है। इससे काम के प्रति आपका उत्साह पूरे समय बना रहेगा। 

3 प्रबल विश्वास (बिलीफ) 
काम के प्रति इस दीवानगी के लिए जरूरी है खुद पर यकीन और आपकी गहरी आस्था। अगर जीवन में आपने कुछ मानक तय किए हैं और आपको अपनी सफलता का विश्वास है तो फिर आप अपने लक्ष्य की ओर जोश और जुनून के साथ बढ़ेंगे। आपको अपने आप पर पूरा विश्वास रखना होगा कि आप यह काम बखूबी कर सकते हैं और आपमें प्रतिभा कीकोई कमी नहीं है। आपकी यही सोच आपको उस लक्ष्य तक पहुंचाएगी जिसका ख्वाब आपने देखा है।

Positive Attitude
Importance of Positive Attitude

“The greatest discovery of my generation is human beings can alter their lives by altering their attitudes of mind”
William James

सकारात्मक दृष्टिकोण चमत्कार कर सकते हैं यह दूसरों के लिए संभवतः असंभव है जो संभवतः दूसरों के लिए संभव है। सकारात्मक दृष्टिकोण बीज है जिसमें से सकारात्मक लक्षण, जो सफलता के लिए जरूरी हैं आगे बढ़ते हैं। यह सकारात्मक रवैया फिर से है जो सकारात्मक लक्षणों के पौधे को पानी और फ़ीड करता है।

आपका मन विचारों और विचारों की एक मशीन है अगर आप इसे सकारात्मक, प्रेरक और प्रेरक विचारों से नहीं भरते हैं, तो यह नकारात्मक विचारों के जंगल में बदल जाएगा। आपका मन एक खूबसूरत बगीचा है, यदि आप उसमें खूबसूरत फूलों के पौधों के पौधे को पौधे और पौधों का पोषण नहीं करते हैं, तो यह जंगली लता, झाड़ियों और कांटेदार पौधों की गड़बड़ी में बदल जाएगा।

आपका मन विचारों और विचारों से बाहर एक विशाल फैक्टरी आकर्षक है। आप इस कारखाने के पर्यवेक्षक हैं आपके बेक और कॉल में आपके दो फोरमैन हैं। श्रीमान और श्रीमान। जैसे ही आपका कारखाना एक महान विचार पैदा करता है, आप दोनों फोरमैन को अपने निष्पादन पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित करते हैं। उन दोनों के नाम के रूप में जाना, तदनुसार सुझाव देते हैं। यह आपकी निर्भर है कि आप उनकी सलाह का पालन करें या नहीं। यदि आप 'मिस्टर की सलाह का पालन करना शुरू करते हैं नहीं 'अधिक से अधिक, आप एक नकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना शुरू करते हैं एक समय आता है जब 'मिस्टर नहीं 'ने आपके विचार प्रक्रिया पर पूरा नियंत्रण लिया है एक समय तक और तब आता है जब आपके भीतर एक महान विचार झुकने से पहले, 'श्री नं।' आती है और इसे आकार से बाहर खींचती है, इतना कि 'मिस्टर नहीं 'आप पर एक पूरा नियंत्रण लेता है
यदि सफलता है तो क्या वास्तव में आप को आकर्षित करती है, और निश्चित रूप से हर कोई करता है, तो आपको 'मिस्टर के साथ एक गहन सहयोग करना चाहिए। हाँ ', आपका सकारात्मक फोरमैन
  मेरी पीढ़ी की सबसे बड़ी खोज मनुष्य मनुष्यों के मनोवृत्ति को बदलकर अपने जीवन को बदल सकती है
प्रसिद्ध फ्रांसीसी फिलॉसॉफ़र ब्लेज़ पास्कल को एक बार किसी के द्वारा संपर्क किया गया था। आगंतुक ने कहा, अगर मुझे आपका दिमाग था, तो मैं एक बेहतर व्यक्ति बनूंगा। पास्कल ने उत्तर दिया, एक बेहतर व्यक्ति बनो और आपके दिमाग होंगे।
हमारे दृष्टिकोण के अधिकांश हमारे प्रारंभिक वर्षों के दौरान आकार का है। मुख्य रूप से तीन 'ई' कारक हैं जो हमारे दृष्टिकोण का निर्धारण करते हैं- पर्यावरण, अनुभव और शिक्षा एक सकारात्मक माहौल में, एक सीमांत कलाकार के बाहर रखा जाता है। एक नकारात्मक वातावरण में, एक अच्छा कलाकार का आउटपुट नीचे जाता है। इसी तरह, अगर आपके पास व्यक्ति के साथ सकारात्मक अनुभव होता है, तो उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक और इसके विपरीत होता है। और अंत में, शिक्षा को न केवल सिखाना चाहिए कि कैसे जीवित करना है, बल्कि यह कैसे जीना भी।त कुछ है 
अकेले नकारात्मकता की अनुपस्थिति किसी व्यक्ति को सकारात्मक नहीं बनाती है। सकारात्मक दृष्टिकोण वाले लोगों में कुछ व्यक्तित्व लक्षण हैं जो पहचानना आसान है। वे देखभाल, विश्वास, रोगी और विनम्र हैं उनके पास स्वयं और दूसरों की उच्च अपेक्षाएं हैं वे सकारात्मक परिणामों की आशा करते हैं
दूसरी तरफ, एक नकारात्मक दृष्टिकोण वाले लोग दोस्ती, नौकरियां और रिश्तों को रखने में कठिन समय आते हैं। वे घर पर एक नकारात्मक वातावरण बनाते हैं और काम करते हैं और समाज की जिम्मेदारी बन जाते हैं। वे अपने नकारात्मक व्यवहार को उनके आस-पास और भविष्य की पीढ़ियों तक दूसरे के पास भी देते हैं।

हमारे प्रारंभिक वर्षों के दौरान सकारात्मक दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिए यह बहुत आसान और बेहतर होगा। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अगर हम नकारात्मक दृष्टिकोण प्राप्त करते हैं, चाहे इच्छा के द्वारा या डिफ़ॉल्ट रूप से, हम इसके साथ अटक जाते हैं। हम इसे बदल सकते हैं, हालांकि यह थोड़ा मुश्किल होगा। इसके लिए आपको अतीत से दूर जाना होगा अपने आप को धूल, मुख्यधारा में वापस आ जाओ अपने सपनों को एक साथ रखें और आगे बढ़ें। सकारात्मक, सच्चे, ईमानदार और अच्छे, सकारात्मक विचारों के बारे में सोचकर आप सकारात्मक स्थिति में रहेंगे। इसके अलावा, एक को निम्नलिखित चरणों का सावधानीपूर्वक अभ्यास करना होगा
जब एक बुलून जारी होता है तो उसके रंग या आकृति के कारण नहीं बढ़ जाता है, जो कि अंदर होता है वह इसे ऊपर उठता है। वही आवेदन हमारे जीवन में पाया जा सकता है यह उस गिनती के अंदर है हमारे अंदर जो चीज हमें आगे बढ़ती है वह हमारा दृष्टिकोण है।

विलियम जेम्स ने एक बार कहा:
फोकस बदलें, सकारात्मक के लिए देखो हमें अच्छे शोधकर्ता बनने की जरूरत है, हमें ज़िंदगी में सकारात्मक पर ध्यान देने की जरूरत है। आइए एक व्यक्ति या परिस्थिति में क्या सही है, इसके बारे में जानने के बजाय, जो गलत है उसे ढूंढने के लिए शुरू करें। हमारे कंडीशनिंग के कारण, हम गलती को खोजने के लिए अभ्यस्त हैं और गलत चीज़ों की तलाश में हैं जो हम सकारात्मक तस्वीर देखने के लिए भूल जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति और हर स्थिति में कुछ सकारात्मक है कभी-कभी हमें सकारात्मक देखने के लिए गहराई तक जाना पड़ता है क्योंकि यह स्पष्ट नहीं हो सकता है इसके अलावा, हम अन्य लोगों और परिस्थितियों में जो गलत है, हम यह भूलने के लिए भूल जाते हैं कि हम क्या चाहते हैं। किसी ने एक बार कहा था कि एक बंद घड़ी भी दिन में दो बार सही है।
अब इसे करने की आदत बनाओ एक पूरा काम पूरा और energizing है। एक अधूरी काम एक टैंक से रिसाव की तरह ऊर्जा को नाल देती है। यदि आप सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना और बनाए रखना चाहते हैं, तो वर्तमान में रहने की आदत डालें और अब इसे करें। वाक्यांश 'अब इसे करो' वाक्यांश जानें और विलंब बंद करो
कृतज्ञता का एक दृष्टिकोण विकसित करें अपने आशीर्वादों पर ध्यान न दें, आपकी परेशानी नहीं। हम उन चीजों के बारे में शिकायत करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिनके पास हमारे पास नहीं है कि हम जो चीजें हैं उनके अधिकार खो देते हैं। के लिए आभारी होना बहुत कुछ है। लेकिन एक ही टोम में, इसका मतलब यह नहीं है कि आप बेहोश हो जाते हैं, एक तस्करी। यह केवल ऊर्जा की रक्षा के लिए है, जो कि आप अपनी परेशानियों के बारे में शिकायत करते हैं।
सकारात्मक आत्म-सम्मान बनाएं आत्मसम्मान हम खुद के बारे में सोचने का तरीका है। जब हम अंदर अच्छा महसूस करते हैं, तो हमारा प्रदर्शन बढ़ जाता है, रिश्तों को घर और काम पर दोनों में सुधार होता है। दुनिया अच्छे दिखती है भावना और व्यवहार के बीच एक सीधा संबंध है यदि आप जल्दी से सकारात्मक आत्मसम्मान बनाना चाहते हैं, तो सबसे तेज़ तरीके से एक ऐसा है जो दूसरों के लिए कुछ करना है जो आपको नकद या दयालु में चुका नहीं सकते हैं। मनुष्य के रूप में, हम सभी को प्राप्त करने और लेने की आवश्यकता है। लेकिन उच्च आत्म सम्मान के साथ एक स्वस्थ व्यक्तित्व एक है जिसे न केवल लेने की आवश्यकता है बल्कि उसे देना भी है।
नकारात्मक प्रभाव से दूर रहें यदि आप एक ईगल की तरह चढ़ना चाहते हैं, तो आपको ईगल के तरीके सीखना होगा। यदि आप प्राप्तकर्ताओं से संबद्ध हैं, तो आप एक बन जाएंगे। यदि आप विचारकों के साथ संबद्ध हैं, तो आप एक बन जाएंगे यदि आप गवर्स से संबद्ध होते हैं, तो आप एक बन जाएंगे यदि आप शिकायतकर्ताओं से संबद्ध होते हैं, तो आप एक बन जाएंगे। जब भी लोग जीवन में सफल होते हैं, छोटे लोग उन पर दरारें लेते हैं और उन्हें नीचे खींचने की कोशिश करते हैं। छोटे लोगों से लड़ने के लिए, आपको अपने स्तर पर उतरना होगा। नकारात्मक लोगों को आपको नीचे खींचने न दें। जब आप छोटे लोगों से लड़ने से इंकार करते हैं, तो आप जीत जाते हैं। याद रखें, किसी व्यक्ति के चरित्र का न केवल कंपनी द्वारा वह निर्णय लेता है, बल्कि कंपनी द्वारा भी वह टालती है। उन चीजों को पसंद करने के लिए जानें, जिन्हें करने की आवश्यकता है। कुछ चीजें करने की ज़रूरत है कि क्या हमें उन्हें पसंद है या नहीं उदाहरण के लिए, माता अपने जवानों की देखभाल करते हैं वे मज़ेदार और गेम्स नहीं हो सकते हैं, और ये दर्दनाक भी हो सकते हैं। लेकिन अगर हम कार्य को सीखना सीखते हैं, तो असंभव संभव हो जाता है। किसी ने कहा, जो आवश्यक है उसे करना शुरू करो, तो क्या संभव है, और अचानक आप असंभव कर रहे हैं।
एक सकारात्मक के साथ अपना दिन प्रारंभ करें सुबह में कुछ सकारात्मक बात पढ़ें या सुनो। एक अच्छी रात की नींद के बाद हम आराम कर रहे हैं और हमारे अवचेतन ग्रहणशील है। यह दिन के लिए टोन सेट करता है, और हमें हर दिन एक सकारात्मक दिन बनाने के लिए सही मन में रखता है। परिवर्तन के बारे में लाने के लिए, हमें सचेत प्रयास करने की जरूरत है और हमारे जीवन के सकारात्मक विचारों और व्यवहार का हिस्सा बनाने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। जब तक वे एक आदत बनने तक सकारात्मक विचार रखते हुए अभ्यास करें
अंत में, यदि आप अपना जीवन बदलना चाहते हैं, तो आपको तत्काल आरंभ करने की ज़रूरत है और इसे पूरी तरह से करना चाहिए।

सकारात्मक व्यवहार और सफलता
POSITIVE ATTITUDE AND SUCCESS

सकारात्मक दृष्टिकोण आशा देता है सकारात्मक दृष्टिकोण आपको आश्वासन देता है सकारात्मक दृष्टिकोण अंधेरे में प्रकाश को देखने का एक मानसिक लक्षण है। यदि आप सकारात्मक स्वभाव के व्यक्ति हैं तो आप हमेशा जीवन के उज्ज्वल पक्ष देखते हैं। ऐसा क्यों है?
यदि आप कहते हैं, मैं कर सकता हूँ, आप करेंगे
यदि आप कहते हैं, मैं नहीं कर सकता, आप कभी नहीं करेंगे

ऐसा नहीं है क्योंकि चीजें मुश्किल हैं कि हम हिम्मत नहीं करते;
ऐसा इसलिए है क्योंकि हम हिम्मत नहीं करते कि वे मुश्किल ... .. सेनेका
जब ज्यादातर लोगों का कहना है कि कांच आधा खाली है, तो कुछ लोग इस बात पर जोर देते हैं कि कांच आधा भरा है।
जब एक कार्य दो व्यक्तियों को सौंपा जाता है, उनमें से एक का कहना है कि यह मुश्किल है और नहीं किया जा सकता है, दूसरे व्यक्ति का कहना है कि इसे और अधिक प्रयास की आवश्यकता है और किया जा सकता है।
जब सिकंदर के थके हुए सेना ने महान ने सिंधु से आगे बढ़ने से इनकार कर दिया, तो अब कोई असंभव काम करना कह रहा था, अलेक्जेंडर ने कहा कि सिंधु को पार किया जा सकता है और सिंधु परे राजा पराजित हो सकते हैं और उसने किया था।
जब नेपोलियन ने आल्प्स को पार करने के लिए अपनी सेना का आदेश दिया, तो उन्होंने कहा यह असंभव था नेपोलियन ने जवाब दिया, असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोश में लिखा है।

जवाब सकारात्मक दृष्टिकोण है

सफलता और सकारात्मक दृष्टिकोण के बीच एक अंतरंग संबंध है। कोई भी कभी सफल नहीं हुआ है, उसकी यात्रा में कभी भी 'काफी' ने कहा है कोई भी कभी भी सफल नहीं रहा है, सफलता के लिए अपनी यात्रा में कभी भी- आशा खो चुकी है। कोई भी जिसने किसी कार्य के लिए 'असंभव' कहा है, वह संभवतः इसे संभव बनाने के लिए चले गए हैं। लेकिन इसके विपरीत अक्सर यह सच है:
गीता रवैया बोलती है समीक्षकों ने गीता द्वारा लिखी रवैये को समझने में असफल रहे हैं। गीता उच्चतम पुण्य के रूप में गैर-संलग्न रवैया को कायम करती है। गैर-अनुलग्न क्रिया में निम्न लाभ हैं
आप पक्ष के डर के बिना काम कर सकते हैं 
आप केवल काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं
आपका प्रदर्शन स्तर उच्च है
आप अपने काम में पूरी तरह से अवशोषित कर रहे हैं
आपके लिए कोई बाधा या व्याकुलता नहीं है
आपकी सफलता की संभावना बहुत अधिक है

आलोचकों ने गैर-लगाव की व्याख्या मानवीय रूप से संभवतः कुछ नहीं की है। उनके अनुसार कोई भी प्रेरणा के बिना काम कर सकता है। लेकिन यह पश्चिमी विद्वानों का विचार है। भारतीय लोकाचार काफी भिन्न है इसके अलावा, उपरोक्त गैर-लगाव की व्याख्या, भ्रामक है। गैर-अनुलग्नक का अर्थ केवल आंतरिक मूल्य के लिए अपना काम करने का अर्थ है जो इसे करने में निहित है और इसके साथ जुड़े इनाम या पारिश्रमिक के कारण नहीं। यह काफी तार्किक है 'काम' केवल एक चीज है जिसे आप नियंत्रण करते हैं। अपने काम से जुड़े फलों पर आपका कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है यह रवैया आपको अपनी प्रगति में विफलता की अनुमति देता है। यह रवैया आपको अपने मन की शांति देता है। यह रवैया आपको संघर्ष और कठिन परिस्थितियों में भी जाने की सुविधा देता है यह वास्तव में रवैया है जो सभी सफल लोगों के पास है।

Darcy ई। गिबन्स कहते हैं, सफलता सिर्फ दृष्टिकोण का मामला है“Success is just a matter of attitude” एक सूक्ष्म रूप से प्रकृति की प्रकृति को निजी जीवन से बचने के लिए उद्देश्य धारणा और सोचा की दुनिया में लम्बा होता है।

दुनिया में सभी महान काम तब प्राप्त किए गए हैं जब पुरुष अपने व्यक्तिगत आत्म और अहंकार की संकीर्ण सीमाओं से परे चले गए हैं। यह काम करने का रवैया होना चाहिए।

किसी संगठन की स्थापना या राष्ट्रों की स्वतंत्रता या यहां तक कि महान आविष्कार या उच्च और विकसित सामाजिक मूल्यों के उभरने के लिए आंदोलनों की तरह किसी भी महान कार्य के बारे में सोचो। ऐसे सभी महान कर्मों में जबरदस्त बलिदान शामिल है और शक्ति होगी। वे संभव नहीं होते यदि नेताओं और दूरदर्शिता स्वार्थी, अहंकारी और उनके व्यक्तिगत लाभ में शामिल थी।
रवैया और प्रभावशीलता सफलता के दो स्तंभ हैं। शुरुआत में हमने रवैया के बारे में कुछ बात की थी आइए हम रवैया पर थोड़ी अधिक विस्तारित करें।
ऐसा क्यों है कि जब एक ही विषय को दो प्रोफेसरों द्वारा सिखाया जाता है, तो छात्रों को एक और दूसरा नहीं? जवाब रवैया है
ऐसा क्यों है कि जब कोई समस्या उत्पन्न होती है तो एक आदमी झगड़ा करना शुरू कर देता है, लड़ता है, लेकिन एक ही समस्या का सामना करना पड़ता है, दूसरे आदमी समस्या को हलचल से बाहर निकालता है।
ऐसा क्यों है कि जब दो छात्रों का प्रदर्शन खराब होता है, तो एक को सुधारना शुरू हो जाता है, लेकिन दूसरा आगे खराब होता है? जवाब रवैया है
आपका रवैया उस योग का कुल योग है जो आप एक व्यक्ति के रूप में और एक व्यक्ति के रूप में हैं

13. Angry 

गुस्सा 

कई लोग गुस्से का अभिनय करते हैं, दफ्तर में, मित्रों में या सहयोगियों में, लेकिन वो गुस्सा कब खुद उनका स्वभाव बन जाता है, वे समझ नहीं पाते। समय गुजरने के साथ ही व्यवहार बदलने लगता है। हमेशा प्रयास करें कि दुनियादारी की बातों में आपका अपना स्वभाव कहीं छूट ना जाए। आप जैसे हैं, अपनेआप को वैसा ही कैसे रखें, इस बात को समझने के लिए थोड़ा ध्यान में उतरना होगा।
हम कभी-कभी क्रोध करते हैं, लेकिन क्रोध हमारा मूल स्वभाव नहीं है। क्या किया जाए कि बाहरी अभिनय हमारे भीतरी स्वभाव पर हावी ना हो। क्रोध पहले व्यवहार में आता है, फिर हमारा स्वभाव बन जाता है। क्रोध स्वभाव में आता है तो सबसे पहले ये हमारी सोच खत्म करता है, फिर संवेदनाओं को मारता है। संवेदनाहीन मानव पशुवत हो जाता है।
क्रोध को अपने स्वभाव में उतरने से कैसे रोका जाए

बाहरी दुनिया को बाहर ही रहने दें। बाहरी दुनिया और भीतरी संसार के बीच थोड़ा अंतर होना चाहिए। ये अंतर लाने का सबसे सरल तरीका है, ध्यान। थोड़ा मेडिटेशन रोज करें। अपने परिवार के साथ समय बिताएं। थोड़ा समय खुद के लिए निकालें। एकांत में बैठें। किसी मंदिर या प्राकृतिक स्थान के निकट बैठें।
महाभारत में श्रीकृष्ण खुद के लिए भी समय निकालते हैं

महाभारत में श्रीकृष्ण ने संसार भर के काम किए, लेकिन खुद के लिए भी समय निकालते हैं। गोकुल या वृंदावन में जब रहे, थोड़ा समय खुद को जरूर देते। अकेले वन में या यमुना किनारे बैठकर बांसुरी बजाते हैं। संगीत हमारी संवेदनाओं को सिंचता है। ध्यान उन्हें दृढ़ बनाता है। एकांत उन्हें नवजीवन देता है। हम जब खुद को समय देंगे, खुद पर ध्यान देंगे तो फिर संसार का बाहरी आवरण, बाहर ही रहेगा। आप भीतर से वो ही रहेंगे जो आप हैं।


14. Anxiety
तनाव तथा मनोचिकित्सा
1. परिचय
2. तनाव क्या है ?
3. तनाव के सामान्य स्रोत
4. तनाव तथा तनाव की अतिसंवेदनशीलता के प्रभावों पर असर डालने वाले कारक
5. तनाव के प्रभाव
6. तनाव का नियंत्रण
7. विश्राम करने तथा ऊर्जावान बनने के स्वस्थ्य तरीके
8. जीवन जीने के स्वस्थ्य तरीके

परिचय
तनाव के बगैर जिंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती है। एक हद तक मनोवैज्ञानिक तनाव हमारे जीवन का एक ऐसा हिस्सा होता है, जो सामान्य व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक साबित हो सकता है। हालांकि यदि ये तनाव अधिक मात्रा में उत्पन्न हो जाएं तब मनोचिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है, अन्यथा ये आपको मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार बना सकते हैं और आपमें मनोव्यथा उत्पन्न कर सकते हैं। सामान्यतः असमान्य मनोविज्ञान पर तनाव के महत्व का अच्छा प्रमाण पाया गया है, यद्यपि इससे पैदा होने वाले विशेष जोखिम और सुरक्षात्मक प्रणालियों के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। नकारात्मक या तनावपूर्ण जीवन की घटनाओं से कई प्रकार के मानसिक व्यवधान पैदा होते हैं, जिनमें मूड तथा चिंता से जुड़े व्यवधान शामिल हैं। यौन शोषण, शारीरिक दुर्व्यवहार, भावनात्मक दुर्व्यवहार, घरेलू हिंसा, तथा डराने-धमकाने समेत बचपन और वयस्क उम्र में हुए दुर्व्यवहार को मानसिक व्यवधान के कारण माने जाते हैं, जो एक जटिल सामाजिक, पारिवारिक, मनोवैज्ञानिक तथा जैववैज्ञानिक कारकों के जरिए पैदा होते। मुख्य खतरा ऐसे अनुभवों के लंबे समय तक जमा होने से पैदा होता है, हालांकि कभी-कभी किसी एक बड़े आघात से भी मनोविकृति उत्पन्न हो जाती है, जैसे- PTSD। ऐसे अनुभवों के प्रति लचीलेपन में अंतर देखा जाता है और व्यक्ति पर किन्हीं अनुभवों के प्रति कोई असर नहीं पड़ता, पर कुछ अनुभव उनके लिए संवेदनशील साबित होते हैं। लचीलेपन में भिन्नता से जुड़े लक्षणों में शामिल हैं- जेनेटिक संवेदनशीलता, स्वभावगत लगण, प्रज्ञान समूह, उबरने के पैटर्न तथा अन्य अनुभव।
तनाव क्या है ?
तनाव को किसी ऐसे शारीरिक, रासायनिक या भावनात्मक कारक के रूप में समझा जा सकता है, जो शारीरिक तथा मानसिक बेचैनी उत्पन्न करे और वह रोग निर्माण का एक कारक बन सकता है। ऐसे शारीरिक या रासायनिक कारक जो तनाव पैदा कर सकते हैं, उनमें - सदमा, संक्रमण, विष, बीमारी तथा किसी प्रकार की चोट शामिल होते हैं। तनाव के भावनात्मक कारक तथा दबाव कई सारे हैं और अलग-अलग प्रकार के होते हैं। कुछ लोग जहां “स्ट्रेस” को मनोवैज्ञानिक तनाव से जोड़ कर देखते हैं, तो वहीं वैज्ञानिक और डॉक्टर इस पद को ऐसे कारक के रूप में दर्शाने में इस्तेमाल करते हैं, जो शारीरिक कार्यों की स्थिरता तथा संतुलन में व्यवधान पैदा करता है। जब लोग अपने आस-पास होने वाली किसी चीज़ से तनाव ग्रस्त महसूस करते हैं, तो उनके शरीर रक्त में कुछ रसायन छोड़कर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। ये रसायन लोगों को अधिक ऊर्जा तथा मजबूती प्रदान करते हैं।
हल्के मात्रा में दबाव तथा तनाव कभी-कभी फ़ायदेमंद होता है। उदाहरण के लिए कोई प्रोजेक्ट या असाइन्मेंट पूरा करते समय हल्का दबाव मसहूस करने से हम प्रायः अपना काम अच्छी तरह से पूरा कर पाते हैं और काम करते समय हमारा उत्साह भी बना रहता है। तनाव दो प्रकार के होते हैं: यूस्ट्रेस (सकारात्मक तनाव ) तथा डिस्ट्रेस (नकारात्मक तनाव), जिसका सामान्य अर्थ चुनौती तथा अधिक बोझ होता है। जब तनाव अधिक होता है या अनियंत्रित हो जाता है, तब यह नकारात्मक प्रभाव दिखाता है।
तनाव के सामान्य स्रोत जीवन रक्षा तनाव (सर्वाइवल स्ट्रेस):
जब किसी व्यक्ति को इस बात का भय हो कि कोई व्यक्ति या कोई चीज़ उसे शारीरिक रूप से चोट पहुंचा सकता है, तब उसका शरीर स्वाभाविक रूप से ऊर्जा अतिरेक के साथ प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है ताकि वह उस खतरनाक परिस्थिति (युद्ध) में बेहतर रूप से जीने में सक्षम हो जाए या पूरी तरह से उससे (युद्ध से) पलायन ही कर जाए। यह जीवन बचाने का तनाव है।
आंतरिक तनाव
आंतरिक तनाव वह तनाव है जहां लोग स्वयं को ही तनावग्रस्त बना डालते हैं। प्रायः जब हम ऐसी चीज़ों के प्रति डर जाते हैं जिनपर हमारा नियंत्रण न हो या हम स्वयं को तनाव पैदा करने वाली परिस्थिति में डाल दें, तो प्रायः आंतरिक तनाव उत्पन्न होता है। कुछ लोग भाग-दौड़, तनावग्रस्त जीवन पद्धति के आदी हो जाते हैं, जो दबाव में जीने की वजह से पैदा होता है। वे तब तनावपूर्ण स्थितियों की तलाश में रहते हैं और यदि उन्हें तनावग्रस्त स्थिति न मिले तो वे इस बात से तनाव महसूस करने लगते हैं।
पर्यावरणीय दबाव
यह उन चीजों के प्रतिक्रिया स्वरूप पैदा होता है, जो तनाव पैदा करता है, जैसे शोर-शराबा, भीड़-भाड़, तथा कार्य या परिवार की ओर से दबाव। इन पर्यावरणीय दबावों की पहचान कर और उनसे बचने या उनसे मुकाबला करने के बारे में सीखने से हमें तनाव के स्तर को कम करने में मदद मिल सकती है।
दुर्बलता तथा अत्यधिक काम
इस प्रकार का तनाव लंबे समय के बाद पैदा होता है और इसका आपके शरीर पर गंभीर असर पड़ सकता है। यह अपनी नौकरी, स्कूल या घर में अत्यधिक काम करने से पैदा होता है। आप यदि समय का नियोजन नहीं पाते हैं या आप आराम या सुस्ताने के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं तो यह उस स्थिति में पैदा होता है। यह एक प्रकार का कठिन तनाव है, जिससे बचा जाना चाहिए, क्योंकि लोग इसे अपने नियंत्रण से बाहर मानते हैं।

तनाव पैदा करने वाले कारकों को छोटी अवधि (ऐक्यूट) या लंबी अवधि (क्रॉनिक) के रूप में वर्णित किया जाता है:
छोटी अवधि (ऐक्यूट) का तनाव तुरंत पैदा होने वाले खतरे के प्रति प्रतिक्रिया होता है, जिसे युद्ध या युद्धक प्रतिक्रिया भी कहते हैं। यह तब होता है, जब मस्तिष्क का प्रारंभिक हिस्सा और मस्तिष्क के अंदर के कुछ रासायन संभावित हानिकारक दबाव कारक या चेतावनी के प्रति अपनी प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं।
लंबी अवधि (क्रॉनिक) के तनाव कारक ऐसे दबाव होते हैं, जो लड़ाई करने की चाहत दब जाने के बाद चालू रहते हैं और आगे भी जारी रहते हैं। क्रॉनिक तनाव कारकों में शामिल होते हैं: वर्तमान में जारी दबावपूर्ण कार्य, वर्तमान में जारी संबंध से जुड़ी समस्या, अलगाव, तथा निरंतर वित्तीय चिंताएं।
तनाव तथा तनाव की अतिसंवेदनशीलता के प्रभावों पर असर डालने वाले कारक
तनाव के प्रति किसी व्यक्ति की संवेदनशीलता को किसी एक या इन सभी कारकों द्वारा प्रभावित किया जा सकता है, यानि इसका मतबल है कि हर व्यक्ति का तनाव के कारकों के प्रति सहनशीलत अलग-अलग होती है। और ये कारकों उनके लिए निश्चित नहीं रहते, अतः समय के साथ हरेक व्यक्ति की तनाव सहनशीलता बदलती रहती है:
बचपन का अनुभव (कोई दुर्व्यवहार जो तनाव की संवेदनशीलता को बढ़ा सकती है)
व्यक्तित्व (कुछ व्यक्तित्व अन्य की अपेक्षा तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।)
जेनेटिक्स (खासकर वंशानुगत ‘रिलेक्सेशन रेस्पोंस’, जो सेरोटोनिल स्तर से जुड़ा हो, जो मस्तिष्क के ‘स्वास्थ्य का रसायन’ होता है।)
रोगनिरोधी असामान्यता (कुछ रोग उत्पन्न कर सकते हैं, जैसे गठिया तथा एक्जिमा, जिससे तनाव के प्रति लचीलापन कम हो सकता है।)
लाइफस्टाइल (मुख्यतः अपर्याप्त आहार तथा व्यायाम की कमी)
तनाव पैदा करने वाले कारकों की अवधि तथा उनकी तीव्रता।
तनाव की उपस्थिति के लिए त्वरित जांच के सूचक
निद्रा व्यवधान
भूख की कमी
अपर्याप्त एकाग्रता या अपर्याप्त याददाश्त
प्रदर्शन में कमी
अलक्षणात्मक त्रुटियां या पूरा न की गई समय सीमा
क्रोध या चिड़चिड़ापन
हिंसक या समाज के खिलाफ व्यवहार
भावनात्मक आवेग
शराब या ड्रग की आदत
घबराहट की आदत
तनाव के प्रभाव
शारीरिक प्रभाव
तनाव के शारीरिक प्रभाव मुख्तः न्यूरो-एंडोक्राइनो-इम्युनोलॉजिकल मार्ग से उत्पन्न होते हैं। तनाव के कारक की जो भी प्रकृति हो पर उनके प्रति शरीर की प्रतिक्रिया सदैव एक समान रहती है। नीचे हमारे शरीर के ऊपर पड़ने वाले तनाव के शारीरिक प्रभाव दिए जा रहे हैं:
धड़कन : हृदय का स्पंदन बढ़ जाता है।
सांस बढ़ जाती है, और इसकी लंबाई छोटी हो जाती है।
थरथराहट
जुकाम, अत्यधिक चिपचिपाहट /पसीना छूटना
गीली भौंह
मांसपेशियों का कड़ापन, उदरीय मांसपेशियों का कड़ापन दिखना, तने हुए हाथ तथा पैर, दबे हुए जबड़े जहां दांत एक-दूसरे के साथ गुंथे हों।
डिस्पेप्सिया /आंत में व्यवधान
बार-बार पेशाब के लिए जाना
बाल झड़ना

मानसिक प्रभाव
यदि पहचान न की जाए और सही तरीके से सुधारा न जाए तो तनाव के मानसिक प्रभाव कई रूप में दिखाई पड़ते हैं। यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि भावनात्मक तनाव को यदि दूर न किया गया तो यह इससे मानसिक कष्ट उत्पन्न हो सकता है और उससे शारीरिक परेशानी (मनोशारीरिक बीमारी के रूप में जाना जाता है) उत्पन्न हो सकती है।

अन्य सामान्य मानसिक प्रभाव हैं:
एकाग्र करने में अक्षम होना।
निर्णय न ले पाना।
आत्मविश्वास की कमी।
चिड़चिड़ापन या बार-बार गुस्सा आना।
अत्यधिक लोभ वाली लालसा।
बेवजह चिंता करना, असहजता तथा चिंता।
बेवजह भय सताना।
घबड़ाहट का दौरा।
गहरे भावनात्मक तथा मूड विचलन।

व्यवहार प्रभाव
तनाव के व्यवहारगत प्रभावों ऐसे तरीके शामिल हैं, जिनमें कोई व्यक्ति तनाव के प्रभाव में कार्य करते हैं और व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। 

नीचे तनाव के कुछ व्यवहारगत प्रभाव दिए जा रहे हैं:
अत्यधिक धुम्रपान
नर्वस होने के लक्षण
शराब या ड्रग्स का अत्यधिक सेवन।
नाखून चबाने तथा बाल खींचने जैसी आदत।
अत्यधिक तथा काफी कम खाना।
मन का कहीं और खोना।
जब-तब दुर्घटना का शिकार होना।
जरा-जरा सी बात पर आक्रामक होना।

यह देखा गया है कि व्यवहारगत तनाव के काफी खतरनाक प्रभाव होते हैं और इससे अभिव्यक्ति तथा सामाजिक संबंध प्रभावित होते हैं।
कुछ प्रकार के क्रॉनिक तथा अधिक आंतरिक तनाव अकेलेपन, गरीबी, वियोग, भेदभाव के कारण पैदा होने वाले अवसाद व हताशा से उपजते हैं, जिससे विषाणु के आक्रमण से लड़ने की शरीर की क्षमता कम हो जाती है और जुकाम, हर्पीस से लेकर एड्स व कैंसर जैसी बीमारियां पैदा हो जाती हैं।

तनाव अन्य हॉर्मोनों, मस्तिष्क न्युरो-ट्रासमिटरों, अन्य हिस्सों में थोड़े अतिरिक्त रसायनिक संदेशों, प्रोस्टैग्लैंडिंस और साथ ही अहम एंजाइम सिस्टम व चयापचय क्रियाओं पर अपने प्रभाव छोड़ सकता है, जिनके बारे में पूरी जानकारी नहीं है।
तनाव से जुड़े कुछ रोग
ऐसिड पेप्टिक रोग
शराब की लत
दमा
दुर्बलता
तनाव से होने वाला सिरदर्द
हाइपरटेंशन
स्मृतिलोप
आंत में गड़बड़ी पैदा होना
इस्केमिक हृदय रोग
मनोवैज्ञानिक रोग
यौन दुर्बलता
सोराइसिस, लाइके प्लैनस, युटिकैरिया, रुराइटस, न्युरोडर्मैटाइटिस इत्यादि जैसे त्वचा रोग, यह सूची पूरी नही है।
तनाव द्वारा उत्पन्न होने वाले रोगों को समझने में और तनाव और तनावजन्य रोगों से बचाव के लिए उपरोक्त अवधारणाओं को समझ कर काफी अहम है। क्लिनिकल स्तर पर किसी व्यक्ति में तनाव को ऐड्रीनल ग्रंथि से स्रावित दो हॉर्मोनों- कॉर्टिसोल तथा DHEA (डीहाइड्रोएपियनड्रोस्टेरोन) द्वारा समझा जाता है। तनाव मापने के होम्स तथा राहे (Rahe) पैमाने के अनुसार ‘जीवन परिवर्तन यूनिट्स’, जो किसी व्यक्ति के पिछले साल के जीवन की घटनाओं में लागू होते हैं, को भी उसके जीवन में शामिल कर लिया जाता है और अंतिम स्कोर निकाला जाता है। उदाहरण के लिए जीवनसाथी की मृत्यु से 100 का स्कोर दिया जाता है।
300+ का स्कोर: बीमारी का खतरा
150-299+ का स्कोर: बीमारी का हल्का खतरा (उपरोक्त खतरे से 30% कम)।
150- स्कोर: बीमारी का काफी कम खतरा

तनाव का नियंत्रण
भौतिक प्रभाव

तनाव का नियंत्रण उसकी पहचान करने से आरंभ होता है। पर यह आसान नहीं होता।
तनाव के वास्तविक स्रोतों की पहचान करने के लिए अपने नजरिए, आदत और आप बचने के लिए जो बहानें बनाते हैं उनपर आपको निकट से ध्यान रखना होगा:
क्या आप अपने तनाव को अस्थायी मानते हैं और भले ही आपको यह याद न हो कि पिछली बार कब आप इसके शिकार हुए थे?
क्या आप तनाव को अपने काम या घरेलू जीवन अथवा अपने व्यक्तित्व के एक अहम हिस्से के रूप में देखते हैं?
क्या आप अपने तनाव के लिए अन्य व्यक्ति या बाहरी घटनाओं को जिम्मेदाद ठहराते हैं अथवा इसे आप पूरी तरह से सामान्य या अप्रत्याशित मानते हैं?
जबतक आप अपने तनाव के निर्माण या उसे बनाए रखने में अपनी भूमिका को स्वीकार नहीं कर लेते, आपका तनाव आपके नियंत्रण में नहीं आएगा।
एक तनाव विवरणिका लिखना आरंभ करें
तनाव विवरणिका आपको जीवन के नियमित तनाव कारकों को पहचानने और उनसे निपटने में मदद करेगी। जब कभी तनाव महसूस करें आप उसके विवरणों को लिख लें। दैनिक रूप से विवरण लिखने से आपको तनाव के पैटर्न और सामान्य विषयों का अंदाजा मिल जाएगा। विवरण इस प्रकार लिखें:
आपके तनाव का कारण (यदि आपको ठीक-ठीक पता न चले तो अंदाजा लगा सकते हैं।)?
आप शारीरिक और मानसिक रूप से कैसा महसूस करते हैं।
प्रतिक्रियास्वरूप आप कैसे कार्य करते हैं।
क्या करने से आप बेहतर महसूस करते हैं।
आपने हाल में जिस तरीके से तनाव से निपटा था, उनपर विचार करें। आपकी तनाव विवरणिका से आप उन बातों को पहचान सकते हैं। क्या आप सही तरीके का इस्तेमाल कर रहे हैं, या आप तनाव से निपटने के लिए अस्वास्थ्यकर, मददगार या अरचनात्मक विधियों का इस्तेमाल कर रहे हैं? दुर्भाग्यवश कई लोग अपने तनाव से निपटने के लिए ऐसी विधियां अपना लेते हैं, जिससे उनकी समस्या और बढ़ जाती है।
तनाव से निपटने के स्वास्थ्यकर तरीके
धुम्रपान
अत्यधिक पानी पीना।
अत्यधिक या काफी कम खाना।
घंटों टीवी या कंप्यूटर के सामने बैठना।
दोस्तों, परिवार वालों तथा क्रियाकलापों से बचना ।
राहत पाने के लिए गोलियों या ड्रग्स का इस्तेमाल करना।
अत्यधिक नींद लेना।
टाल-मटोल की आदत
समस्या से बचने के लिए हमेशा अपने आप को किसी अन्य चीज़ में उलझाए रखना।
अपने तनाव को दूसरे के सिर मढ़ना (घोर निंदा करना, काफी गुस्सा दिखाना, शारीरिक हिंसा)
तनाव से निपटने के कई सही तरीके हैं, पर उन सभी के लिए बदलाव लाने की जरूरत होती है। या तो हम उन परिस्थितियों को बदल दें या उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया में परिवर्तन ले आएं। इन बातों के बारे में गंभीरता से सोचें तथा दूसरे व्यक्तियों से इसके बारे में बात करें, साथ ही उन्हें दूर करने या कम करने के उपाय अपनाएं या तनाव ग्रस्त व्यक्ति को उस स्थिति से बाहर निकालने का प्रयास करें, जो उसके तनाव का कारण है।
तनाव ग्रस्त व्यक्ति को प्रभावित करने वाले कारक और तनाव की संवेदनशीलता पैदा करने कारकों की पहचान करें- इसके लिए आप को यह ध्यान में रखना चाहिए कि आप जिस समस्या से निपट रहे हैं, वह तनाव नियंत्रण विधि के विकास के लिए आवश्यक है।
परिस्थिति को बदलें
तनाव पैदा करने वाले कारकों से बचे।
तनाव पैदा करने वाले कारकों को बदलें।
अपनी प्रतिक्रिया में बदलाव लाएं
तनाव पैदा करने वाले कारकों के मुताबिक अनुकूलित हो जाएं।
तनाव पैदा करने वाले कारकों को स्वीकार कर लें।
अनावश्यक तनाव से बचें
‘ नहीं’ कहना सीखें– अपनी सीमा को जानें और हमेशा उसका ध्यान रखें। व्यक्तिगत या व्यावसायिक जीवन हो आप क्षमता से अधिक जिम्मेदारी लेने से बचें। क्षमता से अधिक जिम्मेदारी उठाने से आप तनाव के शिकार हो सकते हैं।
ऐसे लोगों से बचें जिनसे आपको तनाव पैदा होता है: यदि कोई व्यक्ति आपके जीवन में निरंतर रूप से तनाव पैदा कर रहा है और आप उस संबंध को सही नहीं कर पा रहे हैं, तो आप उस व्यक्ति के साथ व्यतीत करने वाले समय में कमी कर दें या उस संबंध को पूरी तरह से समाप्त कर लें।
अपने परिवेश को नियंत्रण में रखें: यदि शाम की ख़बरें आपको चिंतित कर जाती हैं, तो आप शाम में टीवी ऑफ रखें। यदि ट्रैफिक से आप तनाव ग्रस्त हो जाते हैं तो भले ही दूर वाली पर कम भीड़-भाड़ वाली सड़क लें। यदि आपको बाजार जाना अच्छा नहीं लगता तो आप ऑनलाइन शॉपिंग कर लें।
गर्मागर्म विषय से बचें: यदि आप धर्म या राजनीति की चर्चा पर परेशान हो जाते हैं तो आप उनपर बातचीत करने से बचें। यदि आप एक टॉपिक की हमेशा चर्चा उसी इंसान से करेंगे तो आप चर्चा करने से अपने आप को बचाएं या उसे टाल जाएं।
आपको क्या करना है उसकी सूची बनाएं: अपने कार्यक्रम, जिम्मेदारियों और दैनिक कार्यों का विश्लेषण करें। यदि बहुत सारी चीज़ें शामिल हो जाती हैं तो आप उनमें से ‘करने लायक’ या ‘जरूरी’ के रूप में छांट लें। जो कार्य जरूरी न हों आप उन्हें हटा सकते हैं, या से सूची में सबसे नीचे रखें।
परिस्थिति में बदलाव लाएं
अपनी भावनाओं को दबाने की बजाएं उसे व्यक्त करें। यदि कोई व्यक्ति या कोई चीज़ आपको परेशान करती है तो उसके बारे में आप उस व्यक्ति से खुलकर पर सम्मानपूर्ण तरीके से बात करें। यदि आप अपनी भावनाओं का इज़हार नहीं करेंगे तो आपके मन में असंतोष पैदा होगा और स्थिति जस की तस बनी रह सकती है।
समझौता करने की चाह रखें: यदि आप किसी व्यक्ति को उसका व्यवहार बदलने के लिए कहते हैं तो आप भी अपने आप में बदलाव लाने के लिए तैयार रहें। यदि आप दोनों थोड़ा भी बदलाव ला सकें तो आपकी स्थिति बेहतर हो सकती है।
अधिक निश्चयात्मक बनें: अपनी जीवन के पिछले पायदान पर न रहें। सामने जो भी समस्या आये उसका डट कर और दक्षता पूर्वक मुकाबला करें। यदि आपकी परीक्षाएं आने वाली हैं और आपका बातूनी दोस्त आपके यहां आ जाए तो आप ठान लें कि आपको उसके साथ केवल कुछ मिनटों की बातचीत करनी है।
अपने समय का बेहतर प्रबंधन करें: समय का सही तरह से नियोजन न करने से तनाव पैदा हो सकता है। जब आपके पास समय कम पड़ रहा हो या आप समय के साथ पिछड़ रहे हों तो शांत और एकाग्र रहना नामुमकिन हो जाता है। पर यदि आप नियोजन के साथ चलेंगे तो आपको परेशान नहीं होना पड़ेगा और आप अपने तनाव को काफी कम कर सकते हैं।
तनाव पैदा करने वाले कारकों के अनुसार अनुकूलित होना
समस्याओं को नए नजरिए से देखिए: तनावग्रस्त परिस्थितियों को अधिक सकारात्मक नजरिए से लें। किसी ट्रैफिक जाम पर गुस्सा होने की बजाए, आप उसका इस्तेमाल विराम लेने, अपने आप को पुनः तैयार करने, रेडियो पर अपनी पसंदीदा रेडियो स्टेशन के कार्यक्रम सुनने और कुछ समय अकेले में बिताने के एक मौके के रूप में करें।
बड़ी तस्वीर पर नजर डालें। तनाव ग्रस्त परिस्थिति के नजरिए से देखें: अपने आप से पूछें कि लंबे समय तक इसका रहना कितना अहम होगा। क्या यह एक महीने, एक साल तक चलेगा? या यह लंबे वक्त तक चलेगा? क्या सचमुच इससे परेशान हुआ जा सकता है? उत्तर यदि नहीं होता है, तो अपना ध्यान और ऊर्जा किसी अन्य जगह लगाएं।
अपने मानदंडों को समायोजित करें: हर काम को पूरी दक्षता (पर्फेक्शन के साथ) से करने से तनाव से बचा जा सकता है। महज पर्फेक्शन की मांग की वजह से आप अपने आप को असफलता के हवाले न कर दें। अपने तथा अन्य व्यक्तियों के लिए उचित मानदंड तय करें और ‘पर्याप्त गहराई’ के साथ काम करने की आदत डालना सीख लें।
सकारात्मक बातों पर ध्यान केंद्रित करें: तनाव जब आप तनाव के गिरफ्त में आ रहे हों तो आप उन सभी चीजों के बारे में सोचें जिनकी आप अपने जीवन में तारीफ करते हैं, जिनमें आपके सकारात्मक गुण और ईश्वर के दिए तोहफे भी शामिल हैं। इन सरल उपायों से आपको सही दृष्टिकोण विकसित करने में मदद मिलेगी।
जिन चीज़ों को बदल न सकें उसे स्वीकार करना सीखें
तनाव के कुछ स्रोत अनिवार्य होते हैं। ऐसे कारकों से आप बच नहीं सकते या आप उन्हें बदल भी नहीं सकते, जैसे किसी परिजन की मृत्यु, कोई गंभीर बीमारी, या कोई राष्ट्रीय मंदी। ऐसी स्थिति में उपजे तनाव से उबरने का सबसे अच्छा तरीका है चीजों को उसी रूप में स्वीकार कर लेना। भले ही स्वीकार करना कठिन होगा पर दीर्घकालिक रूप से उस परिस्थिति के विरोध में खड़ा होना जिसे आप बदल नहीं सकते, के मुकाबले यह अधिक आसान और फ़ायदेमंद होगा।
नियंत्रण न हो सकने वाली चीज़ों पर नियंत्रण करने का प्रयास न करें। जीवन में कई चीज़ें नियंत्रण से बाहर होती है- खासकर अन्य लोगों के व्यवहार। उनसे परेशान होकर तनाव लेने बेहतर होगा कि आप ऐसी चीज़ों पर अपना ध्यान केंद्रित करें जिन्हें आप अपने नियंत्रण में ला सकते हैं, जैसे कि ऐसा तरीका जिसे आप समस्याओं से निपटने के लिए चुनते हैं।
सदैव आगे की ओर देखें। कहते हैं: “जो हमें मार नहीं सकता, वह हमें मजबूत बनाता है।” बड़ी चुनौतियों से मुकाबला करते समय आप उन्हें अपने निजी अनुभव के एक मौके के रूप में देखें। यदि आपका गलत चयन आपको तनाव का शिकार बना डालता है, तो आप उनपर विचार करें और अपनी गलतियों से सीखें।
अपनी भावनाओं को बांटें: भरोसेमंद लोगों से बात करें या किसी थेरॉपिस्ट से परामर्श प्राप्त करें। यदि आपनी भावनाओं को दूसरों को बताते हैं, तो भले ही आप उसे बदल न सकें पर इससे आप हल्का महसूस करेंगे।
माफ करना सीखें: इस तथ्य को स्वीकार करें कि हम एक हम एक अधूरी दुनिया में जी रहे हैं, जहां लोग बार-बार गलतियां करते हैं। क्रोध और नाराजगी को मन से बाहर निकालें। दूसरों को माफ कर आप अपनी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त होते हैं और जीवन में आगे की ओर बढ़ते हैं। यदि आप नियमित रूप से मस्ती और आराम के लिए समय निकालते रहेंगे तो आप तनाव के कारणों से बखूबी निपट सकेंगे।
विश्राम करने तथा ऊर्जावान बनने के स्वस्थ्य तरीके
सैर पर जाएं।
प्रकृति के साथ वक्त बिताएं।
किसी अच्छे दोस्त को कॉल करें।
अच्छे व्यायाम के साथ तनाव से मुक्ति पाएं।
अपनी विवरणिका में तनाव के बारे में दर्ज करें।
लंबे समय तक स्नान करें।
सुगंधित मोमबत्ती जलाएं। गर्मागर्म कॉफी या चाय पीएं।
अपने पालतू जानवर के साथ खेलें।
अपने बगीचे में बागवानी करें।
मालिश कराएं।
अच्छी पुस्तक पढ़ें।
संगीत का आनंद लें।
कॉमेडी फिल्म का मज़ा उठाएं।
विश्राम करने का वक्त निकालें। अपने दैनिक कार्यक्रम में विरान तथा आराम करना शामिल करें। उस समय में दूसरा का न करें। यह ऐसा वक्त होगा जब आप हर चीज से मुक्त होकर अपने आप में नई ऊर्जा भरेंगे।
दूसरों के साथ जुड़िए। सकारात्मक विचारों वाले व्यक्तियों के साथ वक्त गुजारिए, जिससे आपको जीवन में नई ऊर्जा मिलेगी। तनाव के नकारात्मक प्रभावों से मुकाबला करने की आपमें मजबूती आएगी।
हर दिन आनंद देने वाला कोई काम करें। हर दिन ऐसे क्रियाकलापों के लिए समय निकालें जिससे आपको आनंद मिलता है, जैसे तारों को देखना, पियानो बजाना अपनी बाइक चलाना।
अपने हास्यबोध को बनाए रखें। इसमें अपने आप पर हंसना भी शामिल करें। हंसने से तनाव से मुक्ति मिलती है।
जीवन जीने के स्वस्थ्य तरीके
खानपान में सुधार करें- विटामिन B तथा मैग्नेशियम का सेवन जरूरी होता है, पर अन्य विटामिन भी लेना चाहिए। तनाव से मुक्ति में विटामिन C अहम माना जाता है। विटामिन D आपके शरीर की दशा बनाए रखता है,खासकर आपकी हड्डियों को मजबूत रखता है। पर्याप्त मात्रा में खनिजों का सेवन करें, क्योंकि ये आपके स्वस्थ्य शरीर तथा मस्तिष्क के लिए जरूरी होते हैं, और इस प्रकार ये तनाव के शिकार होने से बचने में भी आपकी मदद करते है। अपने मौजूदा आहार का मूल्यांकन करें और जहां आपको सुधार नजर आता है, उसपर विचार करें। बेक किए आहार, डब्बा बंद आहार, अत्यधिक नमक, गोलियां और टैब्लेट्स से परहेज करें।
विषैले पदार्थों के सेवन से बचें- स्पष्ट रूप से तंबाकू, शराब भले ही आप अस्थायी रूप से राहत प्रदान करते दिखते हों पर वे शरीर के संतुलन के खिलाफ कार्य करते हैं और इससे आपके तनाव के शिकार होने की संभावना और बढ़ जाती है।
ज्यादा से ज्यादा व्यायाम करें- खासकर तब जब आपको तनाव महसूस हो:
व्यायाम से आपके शरीर का ऐड्रेनेलिन समाप्त होता है और सहायक रसायनों का निर्माण होता है, जिससे आप सकारात्मक ऊर्जा महसूस करते हैं।
व्यायाम आपको तनाव की परिस्थियों से हटाता है।
व्यायाम से आपकी मांसपेशियां और ऊतक में गर्मी आती है, सर्दी में आराम मिलता है और इससे तनाव से राहत मिलती है।
व्यायाम करने से मस्तिष्क की ओर रक्त प्रभाव बढ़ जाता है, जो हमारे शरीर के लिए अच्छा होता है।
व्यायाम से हमारे शरीर का विकास होता है और वह स्वस्थ रहता है, जिससे प्रत्यक्ष रूप से तनाव के शिकार होने से हम बच जाते हैं।
अपने मूड और भावनाओं के प्रति जागरुकता बढ़ाएं- तनाव के अधिक गंभीर स्थिति में पहुंचने से पहले ही उससे मुकाबला करने का ध्यान रखें। विराम करने के तरीकों की खोज करें- जैसे योग, ध्यान, सेल्फ-हिप्नोसिस, मालिश, खुली हवा में सांस लेने, और कोई अन्य लाभदायक कार्य करने से फ़ायदा पहुंचता है।
नींद और आराम एक स्वस्थ संतुलित जीवन के लिए आवश्यक होते हैं। दिन के समय झपकी लेना महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे आप में फिर से ऊर्जा भर जाती है और अपके दिमाग से दबाव और अप्रिय एहसास खत्म होते हैं।
कार्य स्थल पर गुस्सा आना तनाव का लक्षण होता है। गुस्से (तथा उस विषय के लिए किसी अन्य भावनात्मक व्यवहार) व उस तनाव को नियंत्रण में रखें, जिससे आपको गुस्सा आता हो और इसमें तभी सुधार लाया जा सकता यह यदि आपमें चाहत, स्वीकार करने की भावना, प्रज्ञान तथा समर्पण हो। जागरुकता पहली शर्त है। कुछ गुस्सैल व्यक्ति अपने गुस्से पर गर्व का अनुभव करते हैं और कभी बदलना नहीं चाहते; तो कुछ अपने आप पर और दूसरों पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाते। गुस्से पर नियंत्रण करना केवल तभी संभव होता है, जब गुस्सैल व्यक्ति बदलाव के लिए स्वीकार करें और उसके लिए समर्पित रहें। मूल कारण को समझने के लिए परामर्श आवश्यक होता है। व्यक्ति को अपने गुस्से से दूसरों पर होने वाले परिणाम को वस्तुनिष्ठ रूप से और संवेदनशील नजरिए (अपने और दूसरों के लिए) से देखना चाहिए। गुस्सैल व्यक्ति को यह एहसास दिलाकर कि उनका व्यवहार विनाशक और नकारात्मक है, आप इस दिशा में एक अहम कदम बढ़ाएंगे। व्यक्ति को अपने अंदर से चीजों को खुद निकालने दें। गुस्से पर नियंत्रण की दिशा में अगला कदम है- गुस्सैल प्रवृत्ति के कारण को समझना, जो तनाव के कारण तथा तनाव की संभावना वाली परिस्थियों का एक संयोजन होता है। ऐसे व्यक्तियों में पर्याप्त भरोसा तथा तालमेल जगाने के लिए परामर्शदाता को कई सत्र आयोजित करने की जरूरत पड़ सकती है।

15. Family Background


परिवार का प्रभाव
बच्चे का जन्म के बाद उसके सामजिकीकरण में सबसे पहली और महत्वपूर्ण भूमिका परिवार की होती है| इस क्षेत्र में हार्लो (1966) के अध्ययन में अंदर के नवजात शिशु को 1 वर्ष तक पूर्ण एकांत में रखा गया तथा पाया गया कि बंदर का बच्चा असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करने लगा| छोटे बच्चे परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के साथ तादात्मीकरण एवं अनुकरण करके अपना अलग अस्तित्व बनाने का प्रयास करता है| स्टैसी (1967) ने यह विचार प्रस्तुत किया है कि बच्चों में ‘आत्म नियत्रण, माता-पिता के सम्पर्क में रहने तथा उनके प्रभाव के कारण होता है| एक अन्य अध्ययन में ऐरो (1963) ने पाया कि बच्चों का संवेगात्मक और बौद्धिक विकास का प्रत्यक्ष सम्बन्ध बालक की  माँ के साथ अंतः क्रिया की मात्रा तथा विशेषता से प्रत्यक्षतः सम्बन्धित है|
ग्लैसनर  (196२) के अनुसार “ जिस प्रकार जीव का शुभारम्भ गर्भाशय में होता है उसी प्रकार व्यक्तित्व का विकास ‘पारिवारिक सम्बन्धों के गर्भाशय से ही प्रारम्भ होता है| बालक माता-पिता के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों से अन्तः क्रिया करता है| यदि माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्य बालक के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं तो निश्चित रूप से बालक के शीलगुणों में धनात्मक वृद्धि होगी| बालक परिवार में रहकर उचित-अनुचित, नैतिक-अनैतिक आदि मानयताओं को सीख लेता है जो उसके व्यक्तित्व विकास को निर्धारित करता है|
परिवार का आकार, परिवेश तथा जन्म क्रम भी व्यक्तित्व को प्रभावित करता है| परिवार  में सदस्यों की संख्या  अधिक होने से संसाधनों की कमी अवश्यंभावी है| स्थिति में परिवार के आकार का व्यक्तित्व पर ऋणात्मक प्रभाव पड़ता है| पितृविहीन परिवारों में बच्चा  भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ स्वाभाविक प्यार-दुलार से वंचित रह जाता है जिसके परिणामस्वरूप वह कुसमायोजित होता जाता है| हरलॉक (1975) ने जन्म के क्रम को स्वीकार करते हुए कहा है कि प्रथम क्रम में आने वाली सन्तान में असुरक्षा की भावना अधिक होती है| अतः वह स्वयं को जल्द ही परिवार के साथ समायोजित कर स्वयं को परिपक्व बना लेता है| अंतिम क्रम के बालक में यद्यपि स्वतंत्रता की भावना अधिक होती है तथापि उनमें उत्तरदायित्व की भावना कम होती है, इसलिए उसका  सामाजिक समायोजन  अच्छा नहीं होता है| परिवार की आर्थिक स्थिति  व्यक्तित्व को प्रभावित करती है है| यथा-अत्यधिक गरीब परिवार से जुड़े बच्चों में हीनता और असुरक्षा की भावना अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है|


16. Intelligence

बुद्धि की परिभाषायें         

1.  वुडवर्थ के अनुसार, “ बुद्धि, कार्य करने की एक विधि है।”

2.  बकिंघम के अनुसार, “ सीखने की शक्ति ही बुद्धि है।”

3.  टरमन के अनुसार, “ बुद्धि, अमूर्त विचारों के बारे में सोचने की योग्यता  है।”

4.  वुडरो के अनुसार, “ बुद्धि ज्ञान का अर्जन करने की क्षमता है।”

5.  बिने के अनुसार, “ बुद्धि इन चार शब्दों में निहित है - ज्ञान, आविष्कार, निर्देश और आलोचना।”

6.  स्टर्न के अनुसार, “ बुद्धि जीवन की नवीन समस्याओं के समायोजन की सामान्य योग्यता  है।”

7.  बर्ट के अनुसार, “ बुद्धि अच्छी तरह निर्णय करने, समझने तथा तर्क करने की योग्यता  है।”

8.  गाल्टन के अनुसार, “ बुद्धि पहचानने तथा सीखने की शक्ति है।”

9.  थार्नडाइक के अनुसार, “सत्य या तथ्य के दृष्टिकोण से उत्तम प्रतिक्रियाओं की शक्ति ही बुद्धि है।”



                                                                 बुद्धि के सिद्धांत

1.  एक खण्ड बुद्धि का सिद्धांत :-
2.  दो खण्ड बुद्धि का सिद्धांत :-
3.  तीन खण्ड बुद्धि का सिद्धांत :-
4.  बहु खण्ड बुद्धि का सिद्धांत :-
5.  समूह खण्ड बुद्धि का सिद्धांत :-
6.  न्यादर्श या प्रतिदर्श बुद्धि का सिद्धांत :-
7.  पदानुक्रमिक(क्रमिक महत्व) बुद्धि का सिद्धांत :-
8.  त्रि-आयामी बुद्धि का सिद्धांत :-
9.  बुद्धि 'क' और बुद्धि  'ख'का सिद्धांत :-
10.  तरल-ठोस बुद्धि का सिद्धांत :-


बुद्धि परीक्षण
व्यक्ति केवल शारीरिक गुणों से ही एक दूसरे से भिन्न नहीं होते बल्कि मानसिक एवं बौद्धिक गुणों से भी एक दूसरे से भिन्न होते हैं। ये भिन्नताऐं जन्मजात भी होती हैं। कुछ व्यक्ति जन्म से ही प्रखर बुद्धि के तो कुछ मन्द बुद्धि व्यवहार वाले होते हैं।
आजकल बुद्धि को बुद्धि लब्धि के रूप में मापते हैं जो एक संख्यात्मक मान है। बुद्धि परीक्षण का आशय उन परीक्षणों से है जो बुद्धि-लब्धि के रूप में केवल एक संख्या के माध्यम से व्यक्ति के सामान्य बौद्धिक एवं उसमें विद्यमान विभिन्न विशिष्ट योग्यताओं के सम्बंध को इंगित करता है। कौन व्यक्ति कितना बुद्धिमान है, यह जानने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने काफी प्रयत्न किए। बुद्धि को मापने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने मानसिक आयु (MA) और शारीरिक आयु (C.A.) कारक प्रस्तुत किये हैं और इनके आधार पर व्यक्ति की वास्तविक बुद्धि-लब्धि ज्ञात की जाती है।

सफलता वह फल है, जो बहुत स्वादिष्‍ट है और हर कोई उसे चखना चाहता है; लेकिन यह चलकर झोली में आनेवाला फल नहीं है वरन् इस तक पहुँचने के लिए आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। अगर आप सफलता पाने का इंतजार करेंगे तो चूक जाएँगे।
कुछ लोगों से पूछा जाता है कि वे सफलता पाने के लिए क्या कर रहे हैं तो उनका उत्तर होता है कि ‘बस अपने काम में लगे हैं, अब देखते हैं कि सफलता मिलती है या नहीं।’ इस तरह का उत्तर निराशावाद की ओर इशारा करता है। अगर आपका उत्तर होगा कि ‘हाँ, मैं सफलता प्राप्‍त करूँगा’ तो यह आशावाद भी है, और सफलता की गारंटी भी।
कहा गया है—सपने ही सच होते हैं, कल्पनाएँ ही मूर्त रूप लेती हैं। दरअसल, सपने असल जिंदगी की वे योजनाएँ हैं, जिन्हें हम साकार करना चाहते हैं। आप समझ सकते हैं, योजनाएँ बनाना और सपने देखना जितना सरल हो सकता है, लेकिन उन्हें वास्तविक धरातल पर उतारने के लिए हमें अथक प्रयास करने होंगे।

17. Interest

रुचि या शौक़ ऐसी क्रियाएँ होती हैं जो आनंद के लिये अवकाश (फ़ुर्सत) के समय की जाएँ। इनमें खेल, मनोरंजन, कला, संगीत, किसी विषय का अध्ययन या उस से सम्बन्धित चीज़ें इकठ्ठी करना, इत्यादि शामिल हैं। यह क्रियाएँ व्यवसायिक रूप से या पैसे कमाने की चाह में नहीं करी जाती बल्कि केवल व्यक्तिगत दिलचस्पी के अधार पर इनपर समय ख़र्च करा जाता है। रूचि वह प्रेरक शक्ति हैं जो हमे किसी व्यक्ति ,वस्तु, या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है।

शिक्षा मनोविज्ञान में रुचि क्या है?

आमतौर पर रुचि को किसी चीज़ में दिलचस्पी या उसे पसंद करने के रूप में देखा जाता है। शिक्षा मनोविज्ञान में रूचि क्या है? इसका निर्माण कैसे होता है? अच्छी रुचियों को उत्पन्न करने के क्या तरीके हो सकते हैं, ऐसे सवालों पर विचार किया जाता है।
उदाहरण के तौर पर बहुत से स्कूलों में कोशिश होती है कि बच्चों की पढ़ने में रुचि बढ़ाई जाए, ताकि बच्चे कोर्स के अलावा बाकी किताबें भी पढ़ें। इसी तरीके से बच्चों की खेलों में रूचि विकसित करने की बात होती है ताकि वे लोगों के साथ घुले-मिलें। केवल टेलीविज़न, स्मार्ट फोने या वीडियो गेम्स से खेलते रहें।
रुचि क्या है?
मनोवैज्ञानित स्टाउट व रॉस के अनुसार, “यह महत्वपूर्ण होती है और इसमें लगाव होता है।” जैसे अगर किसी की क्रिकेट का खेल देखने में रुचि है तो वह जब भी कोई महत्वपूर्ण मैच टेलीविज़न पर आ रहा होगा, इसे देखना चाहेगा। या फिर रेडियो पर प्रसारित होने वाली कमेंट्री से इसकी अपडेट हासिल करना चाहेगा कि मैच में क्या हो रहा है?
क्रो के अनुसार, “रूचि व प्रेरक शक्ति है जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।”
रूचि होने या न होने के कारण हम चीज़ों में अंतर या फर्क करके देखते हैं। अपनी पसंद या नापसंद का निर्धारण करते हैं। रूचि जन्मजात व अर्जित दोनों होती है। जैसे किसी को बचपन से ही संगीत सीखने या किसी वाद्य यंत्र को बजाने में रूचि होती है। जिसके प्रशिक्षण द्वारा वे अपनी रूचि को प्रोफ़ेशनल तरीके से करियर के रूप में विकसित करते हैं।
रुचि की विशेषता

रूचि के मुख्य रूप से तीन पहलू हैं। पहली है जानना, दूसरा है अनुभव करना और तीसरा है इच्छा करना। किसी चीज़ को जानने से उसके प्रति एक सहज अनुराग पैदा होता है। उसका अनुभव होने से हम पसंद या नापसंद का निर्धारण करते हैं। यही बात आगे जाकर उसके प्रति इच्छा या अनिच्छा का रूप लेती है।
जानना
अनुभव
और इच्छा करना
बालकों में कैसे करें रुचि का विकास
बालकों को चीज़ों से रूबरू होने का अवसर देकर रुचि का विकास कर सकते हैं। जैसे स्कूलों में लायब्रेरी कालांश में बच्चों को अपने पसंद की किताब चुनने और देखने का अवसर देकर हम बच्चों की किताबों में रुचि जाग्रत करते हैं। बच्चों को अपने पसंद को अभिव्यक्ति करने और जानने का मौका देते हैं।
रचनात्मक गतिविधियों में बच्चों की रुचि होती है, अतः बच्चों से ऐसे सवाल पूछे जा सकते हैं जो उनकी रुचि को बढ़ावा दें। जैसे फलां किताब की कहानी अपने शब्दों में लिखिए। ऐसे सवाल लायब्रेरी का उपयोग करने वाले बच्चों को दिया जा सकता है।
ज्ञात चीज़ों से अज्ञात की तरफ ले जाना
बालकों की रूचि के अनुरूप पाठ्य सामग्री का चुनाव
किसी पाठ को पढ़ाना का तरीका अगर रोचक हो तो उस विषय विशेष को सीखने में बच्चों की रूचि काफी बढ़ जाती है। ऐसी बातों का भी ध्यान रखा जा सकता है।
उपरोक्त तरीके से बच्चों में नयी रुचियों का विकास किया जा सकता है।

अभिवृत्ति से हमारा तात्पर्य किसी कौशल विशेष में नैपुण्य प्राप्त करने की व्यक्ति की अप्रकट और अविकसित योग्यता से है। अत: अभिवृत्तियों के मापन के लिये विशेष रूप से निर्मित परीक्षण भावी क्षमताओं की प्रभावोत्पादकता के पूर्वकथन को संभव बनाने का प्रयास करते हैं। अत: भावी निष्पत्तियों के पूर्वकथानात्मक परीक्षण विभिन्न योग्यताओं से संबद्ध होते हैं, अत: कार्य के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिये अनेक अभिवृत्तिपरीक्षणों का निर्माण किया गया है। इस प्रकार हमें सामान्य यांत्रिक, लिपिक, संगीतात्मक तथा अन्य अभिवृत्तिपरीक्षण उपलब्ध हैं।
प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् निर्मित मिनेसोटा फॉर्म बोर्ड परीक्षण का उल्लेख यांत्रिक योग्यता के मापन के सर्वाधिक वैध माध्यम के रूप में किया गया है। इसमें अलग अलग भागों में कटे दो आयामोंवोल रेखाचित्र परीक्ष्य व्यक्ति के सामने रखे जाते हैं जिनमें से उसे ऐसा रेखाचित्र चुनना होता है जो मूल रेखाचित्र में दिखाए गए ठीक ठीक भागों से मिलकर बना हो। यह परीक्षण उन यांत्रिक योग्यताओं का मापन करता है जो स्थानगत वस्तुओं के प्रत्यक्षीकरण तथा जोड़ने तोड़ने की प्रक्रिया से संबद्ध होती हैं। अन्य अभिवृत्तिपरीक्षणों के संबंध में यही कहा जा सकता है कि विशिष्ट योग्यतामापक उदाहरणों की कमी नहीं है।
अभिरुचियों की व्यक्तित्व के उन प्रेरणात्मक पक्षों का अभिव्यंजक कहा गया है जिनका विकास अनुभूत आवश्यकताओं से होता है। अनेक व्यक्तियों में विविध प्रकार के कार्यों के लिये समान योग्यता देखी जाती है, किंतु उनके प्रति इनकी अभिरुचि में स्पष्ट अंतर होता है। यह निर्विवाद है कि हम उसी व्यवसाय में किसी व्यक्ति की संतोषजनक प्रगति की आशा कर सकते हैं जिसके प्रति उसमें योग्यता तथा अभिरुचि दोनों एक साथ वर्तमान हों। अत: अभिरुचियों के माप को योग्यताओं के माप के साथ संयुक्त कर देने पर किसी व्यक्ति की किसी व्यवसाय विशेष में सफलता का पूर्वकथन और अधिक सशक्त हो जाता है।
अनेक अभिरुचि प्रश्नावलियों का निर्माण किया गया जिनमें क्यूडर प्रेफरेंस रेकार्ड (वोकेशनल) प्रमुख है। यह प्रश्नावली अनेक प्रकार के कार्यों के प्रति व्यक्ति की अभिरुचि का मूल्यांकन करने का प्रयास करती है। यह वर्णनात्मक मान है जिसमें परीक्ष्य व्यक्ति को तीन संभव क्रियाओं से संबद्ध प्रत्येक पद के अनुसार अपनी रुचि को--किसे वह सबसे अधिक चाहता है और किसे सबसे कम—व्यक्त करना पड़ता है। इस प्रकार हमें इन नव क्षेत्रों में से प्रत्येक व्यक्ति की मापें उपलब्ध होती हैं : यांत्रिक, संगणनात्मक, वैज्ञानिक, अननयी, कलात्मक, साहित्यिक, संगीतात्मक, सामाजिक सेवा और लिपिक। स्ट्रांग का वोकेशनल इंटरेस्ट ब्लैंक एक अन्य बहुप्रयुक्त व्यावसायिक अभिरुचि तालिका है। स्ट्रांग का सर्वविषयक चार्ट पचास व्यवसायों और कार्यों के क्षेत्र में, जिनमें कानून, चिकित्सा, शिक्षण, इंजीनियरिंग, विक्रेता का कार्य और लेखा आते हैं, व्यक्ति की अभिरुचियों की शक्ति की माप प्रदान करता है। 

18. Learning

अधिगम का अर्थ :-
                           प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन नए-नए अनुभव एकत्रित करता है, इन नए अनुभवों से उसके व्यवहार में परिवर्तन आता है। इस प्रकार नए अनुभव एकत्रित करना तथा इनसे व्यवहार में परिवर्तन आने की प्रक्रिया ही अधिगम है। अधिगम प्रक्रिया निरंतर चलने वाली ओर सार्वभौमिक प्रक्रिया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सिखना अनुभव द्वारा व्यवहार में परिवर्तन है।

अधिगम की परिभाषायें :-

1.  स्किनर के अनुसार, “अधिगम व्यवहार में उतरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।”
2.  वुडवर्थ के अनुसार, “नवीन ज्ञान ओर नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया ही अधिगम है।”
3.  क्रो एवं क्रो के अनुसार, “आदतों, ज्ञान ओर अभिवृतिओं का अर्जन ही अधिगम है।”
4.  गिलफोर्ड के अनुसार, “व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है।”
5.  गेट्स व अन्य के अनुसार, “अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है।”
6.  मार्गन एवं गिलीलैण्ड के अनुसार, “सीखना, अनुभव के परिणामस्वरूप प्राणी के व्यवहार में परिमार्जन है जो                                                      प्राणी द्वारा कुछ समय के लिए धारण किया जाता है।”

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक :-

1.  पुर्व अधिगम :-

2.  विषय वस्तु का स्वरूप :-

3.  विषय के प्रति मनोवृति :-

4.  सीखने की इच्छा :-

5.  सीखने की विधि :-

6.  अभिप्रेरणा :-

7.  वातावरण :-

8.  थकान :-

9.  शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य :-

10.  वंशानुक्रम :-

अधिगम के सिद्धांत

थार्नडाइक का प्रयोग :- 
                                थार्नडाइक ने अपना प्रयोग भूखी बिल्ली पर किया। बिल्ली को कुछ समय तक भूखा रखने के बाद एक पिंजरे(बॉक्स) में बन्ध कर दिया। जिसे  पज़ल बॉक्स(Pazzle Box) कहते हैं। पिंजरे के बाहर भोजन के रूप में थार्नडाइक ने मछली का टुकड़ा रख दिया। पिंजरे के अन्दर एक लिवर(बटन) लगा हुआ था जिसे दबाने से पिंजरे का दरवाज़ा खुल जाता था। भूखी बिल्ली ने भोजन (मछली का टुकड़ा) को प्राप्त करने  व  पिंजरे से बाहर निकलने के लिए अनेक त्रुटिपूर्ण प्रयास किए। बिल्ली के लिए भोजन   उद्दीपक का  काम कर  रहा था ओर उद्दीपक के कारण बिल्ली प्रतिक्रिया कर रही थी।उसने अनेक प्रकार  से बाहर निकलने  का प्रयत्न  किया।एक बार संयोग से उसके पंजे से लिवर दब गया। लिवर दबने से पिंजरे  का दरवाज़ा खुल गया ओर भूखी बिल्ली ने पिंजरे से बाहर निकलकर भोजन को खाकर अपनी  भूख को शान्त किया। थार्नडाइक ने इस प्रयोग को बार- बार  दोहराया। तथा देखा कि प्रत्येक बार बिल्ली को बाहर  निकलने में पिछली बार से कम समय  लगा ओर  कुछ समय बाद बिल्ली बिना किसी भी प्रकार की भूल  के एक ही प्रयास में पिंजरे का दरवाज़ा  खोलना सीख गई। इस प्रकार उद्दीपक ओर अनुक्रिया में  सम्बन्ध स्थापित हो गया।

थार्नडाइक के नियम :-

मुख्य नियम :-

1.  तत्परता का नियम :-
                                          यह नियम कार्य करने से पूर्व तत्पर या तैयार किए जाने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य को सीखने के लिए तत्पर या तैयार होता है, तो उसे शीघ्र ही सीख लेता है। तत्परता में कार्य करने की इच्छा निहित होती है। ध्यान केंद्रित करने मेँ भी तत्परता सहायता करती है।

2.  अभ्यास का नियम :- 
                                         यह नियम किसी कार्य या सीखी गई विषय वस्तु के बार-बार अभ्यास करने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य का अभ्यास करते रहते है, तो उसे सरलतापूर्वक करना सीख जाते है। यदि हम सीखे हुए कार्य का अभ्यास नही करते है, तो उसको भूल जाते है।

3.  प्रभाव (परिणाम) का नियम :- 
                                                    इस नियम को सन्तोष तथा असन्तोष का नियम भी कहते है। इस नियम के अनुसार जिस कार्य को करने से प्राणी को सुख व सन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह बार-बार करना चाहता है और इसके विपरीत जिस कार्य को करने से दुःख या असन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह दोबारा नही करना चाहता है।

अधिगम का अर्थ:-
सीखना या अधिगम एक व्यापक सतत् एवं जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म के उपरांत ही सीखना प्रारंभ कर देता है और जीवन भर कुछ न कुछ सीखता रहता है। धीरे-धीरे वह अपने को वातावरण से समायोजित करने का प्रयत्न करता है। इस समायोजन के दौरान वह अपने अनुभवों से अधिक लाभ उठाने का प्रयास करता है। इस प्रक्रिया को मनोविज्ञान में सीखना कहते हैं। जिस व्यक्ति मंे सीखने की जितनी अधिक शक्ति होती है, उतना ही उसके जीवन का विकास होता है। सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति अनेक क्रियाएंे एवं उपक्रियाऐं करता है। अतः सीखना किसी स्थिति के प्रति सक्रिय प्रतिक्रिया है।
*. बच्चो में सोचना एवं अधिगम 
बालको मे अधिगम की वैकल्पिक संकल्पना
अधिगम की आधुनिक वैकल्पिक अवधारणाओं को निम्नलिखित दो मुख्य श्रेणिओ में बांटा जा सकता है:-
व्यवहारवादी साहचर्य सिद्धांत:विभिन्न उद्दीपनो के प्रति सिखने वाले की विशेष अनुक्रिया होती है । इन उद्दीपनो तथा अनुक्रिया के साहचर्य से उसके व्यवहार में जो परिवर्तन आते है, उनकी व्याख्या करना ही इस सिद्धांत का उद्देश्य होता है । इस प्रकार के सिधान्तो के अंतर्गत थॉर्नडाइक , पेवलोव और स्किनर के अधिगम सिद्धांत आते है।
ज्ञानात्मक व् क्षेत्र संगठनात्मक सिद्धांत:अधिगम का यह सिद्धांत सिखने की प्रक्रिया में उद्देश्य अंतर्दृष्टि -----और सूझबूझ के महत्व को प्रदर्शित करता है । इस प्रकार के सिधान्तो के अंतर्गत वर्देमीर, कोहलर एवं लेविन के अधिगम सिद्धांत आते है।

1. उद्दीपन- अनुक्रिया का सिद्धान्त (Thorndike’s Stimulus Response Theory)
2. पावलव का शास्त्रीय अनुबंधन अनुकूलित- अनुक्रिया का सिद्धातं (Pavlov Theory of conditioned Response)
3. स्किनर का सक्रिय अनुबन्धन (Instrumental conditioning) सिद्धान्त
4. अन्र्तदृष्टि का सिद्धान्त
5. निर्मितिवाद (Constructivism)
6. अनुभवात्मक अधिगम सिद्धांत
7. हल का व्यवस्थित व्यवहार सिद्धांत

उद्दीपन-अनुक्रिया का सिद्धान्त (Thorndike’s Stimulus Response Theory):- 
किसी भी कार्य को व्यक्ति एकदम नहीं सीख पाता है। सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति प्रयत्न करता है और कठिनाईयां आती हैं तथा गलती व भूलं भी करता है। लगातार कोषिष करते रहने से भूलें व गलती कम होती जाती हैं। इसलिए इस सिद्धांत को प्रयत्न और भूल(Trial and error) का सिद्धात कहते हैं।
थार्नडाइक ने इस सिद्धांत का परीक्षण भूखी बिल्ली पर किया। उसने प्रयोग में भूखी बिल्ली को पिंजड़े में बंद कर दिया। पिंजड़े का दरवाजा एक खटके के दबने से खुलता था। उसके बाहर भोजन रख दिया। बिल्ली में भोजन (उद्दीपक) देखकर प्रतिक्रिया आरम्भ की। उसने अनेक प्रकार से बाहर निकलने का प्रयत्न किया। एक बार संयोग से उसका पंजा खटके पर पड़ गया। और दरवाजा खुल गया। थार्नडाइक ने इस प्रयोग को अनेक बार दोहराया। अन्त में एक समय ऐसा आ गया जब बिल्ली किसी प्रकार की भूल न करके खटके को दबा कर पिंजड़े का दरवाजा खोलने लगी। इस प्रकार उद्दीपक और प्रतिक्रिया में संबंध स्थापित हो गया।
पावलव का शास्त्रीय अनुबंधन (अनुकूलित-अनुक्रिया) का सिद्धातं(Pavlov Theory of conditioned Response)
इस सिद्धान्त का प्रतिपादन 1904 में में पावलव ने किया था। उसने अनुबंधित क्रिया(Conditioned Response) को समझाने के लिए कुत्ते के ऊपर प्रयोग किया। प्रारम्भ में भूखे कुत्ते के मंह में भोजन देखकर लार आ जाना स्वाभाविक क्रिया है।
1) पावलव में प्रयोग के प्रारम्भ में कई दिनो तक खाने के साथ घण्टी बजा कर खाना दिया। (खाना घण्टी) यह प्रयोग कई दिनां- तक दोहराने पर पाया गया कि खाना एवं घण्टी में सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है। एवं स्वाभाविक क्रिया-लार टपकना होती है।
2) इसके बाद केवल घण्टी बजाई परन्तु खाना साथ में नहीं दिया गया। इससे यह पाया गया कि कुत्ता स्वाभाविक क्रिया (लार टपकती है) करता है। इस प्रयोग को इस प्रकार दर्षाया जा सकता है-
इस सिद्धांत का प्रयोग पशुआंे एवं मनुष्यों के व्यवहार को सुधारने व परिमार्जन में महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।
सिद्धातं:- अस्वाभाविक (कृत्रिम) उत्तेजना के प्रति स्वाभाविक क्रिया का उत्पन्न होना अनुकूलित अनुक्रिया कहलाती है। उदाहरण - मिठाई की दुकान को देखकर बच्चों के मुंह से लार टपकने लगता है।
स्किनर का सक्रिय अनुबन्धन (Instrumental conditioning)सिद्धान्त
इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अमेरिका के हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बी.एफ स्किनर ने किया। इस सिद्धान्त का प्रमुख आधार थाॅर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित प्रभाव का नियमथा ।
इस नियम के अनुसार यदि किसी अनुक्रिया या व्यवहार के बाद सन्तोष या आनन्द की अनुभूति होती हैं तो प्राणी उस व्यवहार को दोहराना चाहता हैं इसके विपरीत यदि किसी अनुक्रिया के पश्चात् असन्तोष या दुःख का अनुभव होता हैं तो प्राणी उस व्यवहार को पुनः दोहराना नहीं चाहता । इस प्रकार ऐसे व्यवहार में उत्तेजन एंव अनुक्रिया का बन्धन (S-R bond) कमजोर हो जाता हैं यही नियम स्किनर के क्रिया प्रसूत व अनुबन्धन का आधार हैं।
ज्ञानात्मक व् क्षेत्र संगठनात्मक सिद्धांत: अधिगम का यह सिद्धांत सिखने की प्रक्रिया में उद्देश्य अंतर्दृष्टि और सूझबूझ के महत्व को प्रदर्शित करता है । इस प्रकार के सिधान्तो के अंतर्गत वर्देमीर, कोहलर एवं लेविन के अधिगम सिद्धांत आते है।
‘‘सूझू तथा अन्र्तदृष्टि का सिद्धान्त’’ 

(Kohler ’s Theory of Insight):-
सूझ द्वारा सीखने के सिद्धांत के प्रतिपादक जर्मनी के गेस्टाल्टवादी है। इसलिए इस सिद्धांत को गेस्टाल्ट सिद्धांत भी कहते हैं। इनके अनुसार व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण परिस्थिति को अपनी मानसिक शक्ति से अच्छी तरह समझ या सीख लेता है। इस प्रकार वह अपनी सूझ के कारण करता है। इस संबंध में अनेक प्रयोग किए जा चुके हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध प्रयोग कोहलर का है।
कोहलर का प्रयोग - 
कोहलर ने एक भूखे चिम्पाजी को एक कमरे में बंद किया। कमरे की छत में कुछ केले इस प्रकार टाँग दिए कि वे चिम्पाजी की पहंच के बाहर थे। कमरे में कुछ दूरी पर तीन-चार खाली बक्से भी रखे गए। चिम्पांजी ने उछल कर केले लेने का प्रयास किया पर सफल नहीं हुआ। कुछ समय पश्चात फर्ष पर रखे खाली बक्सों को देखकर उनको केले के नीचे खींच कर उस पर चढ़ गया केले प्राप्त कर लिए। यह उसकी सूझ ही है जिसने उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता दी। चिम्पान्जी के समान बालक और व्यक्ति भी सूझ द्वारा सीखते हैं
ज्ञानात्मक व् क्षेत्र संगठनात्मक सिद्धांत: अधिगम का यह सिद्धांत सिखने की प्रक्रिया में उद्देश्य अंतर्दृष्टि और सूझबूझ के महत्व को प्रदर्शित करता है । इस प्रकार के सिधान्तो के अंतर्गत वर्देमीर, कोहलर एवं लेविन के अधिगम सिद्धांत आते है।
‘‘सूझू तथा अन्र्तदृष्टि का सिद्धान्त’’ 

(Kohler ’s Theory of Insight):-
सूझ द्वारा सीखने के सिद्धांत के प्रतिपादक जर्मनी के गेस्टाल्टवादी है। इसलिए इस सिद्धांत को गेस्टाल्ट सिद्धांत भी कहते हैं। इनके अनुसार व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण परिस्थिति को अपनी मानसिक शक्ति से अच्छी तरह समझ या सीख लेता है। इस प्रकार वह अपनी सूझ के कारण करता है। इस संबंध में अनेक प्रयोग किए जा चुके हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध प्रयोग कोहलर का है।
कोहलर का प्रयोग - 
कोहलर ने एक भूखे चिम्पाजी को एक कमरे में बंद किया। कमरे की छत में कुछ केले इस प्रकार टाँग दिए कि वे चिम्पाजी की पहंुच के बाहर थे। कमरे में कुछ दूरी पर तीन-चार खाली बक्से भी रखे गए। चिम्पांजी ने उछल कर केले लेने का प्रयास किया पर सफल नहीं हुआ। कुछ समय पश्चात फर्ष पर रखे खाली बक्सों को देखकर उनको केले के नीचे खींच कर उस पर चढ़ गया केले प्राप्त कर लिए। यह उसकी सूझ ही है जिसने उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता दी। चिम्पान्जी के समान बालक और व्यक्ति भी सूझ द्वारा सीखते हैं।
अधिगम का अर्थ (meaning of learning)
सामान्य अर्थ में अधिगम व्यव्हार में परिवर्तन को कहा जाता है।परंतु सभी तरह के व्यवहार में हुए परिवर्तन को अधिगम नही कहा जाता है।

अधिगम या प्रशिक्षण के ट्रांसफर का सामान्य अर्थ 
किसी एक परिस्थिति में अर्जित ज्ञान ,आदतों ,दृष्टिकोण अथवा अन्य अनुकरियो का अन्य किसी अन्य परिस्थिति में अनुप्रयोग करना. अधिगम की परिभासाये (defination of learning) जे.पी.गिल्फोर्ड के अनुसार=व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है। 

गेट्स के अनुसार ,अनुभवो प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संसोधन व् परिमार्जन करना ही अधिगंम है। स्किनर के अनुसार,प्रगतिसील व्यवहार व्यवस्थापन की प्रिक्रिया को अधिगंम कहते है क्रांबैक के अनुसार-अधिगंम अनुभव के परिणामस्वरुप व्यवहार में परिवर्तन द्वारा व्यक्त होता है।
क्रो एंड क्रो के अनुसार सीखना ,आदतों ,ज्ञान,व् अभिवृत्तियों का अर्जन है। ई आर हिलगार्ड के अनुसार अधिगम वह प्रिक्रिया है जिसमे किसी नई क्रिया का जन्म होता है या सामने आयी हुई परिस्थिति के अनुकूल उसमे उचित परिवर्तन किया जाता है।

गार्डनर मर्फी के अनुसार -अधिगंम शब्द में वातावरण संबंधी आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए व्यवहार में सभी परिवर्तन सम्मिलित होते है। वुडवर्थ के अनुसार-.नवीन ज्ञान और नविन प्रतिक्रियो को प्राप्त करने की प्रिकिरिया ,अधिगम प्रिकिरिया है।

अधिगंम की विशेषताये (Characteristic of learning)

1-अधिगम व्यवहार में परिवर्तन है।
2-अर्जित व्यवहार की प्रकृति अपेक्षाकृत स्थायी होती है।
3-अधिगंम जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रिकिरिया है।
4-अधिगंम एक यूनिवर्सल प्रिकिरिया है।
5-अधिगंम उद्देश्यपूर्ण एवं लक्ष्य निर्देशित होता है।
6-अधिगंम का संबंद अनुभवो की नवीन व्यवस्था से होता है।
7-अधिगंम वातावरण एवं क्रियाशीलता की उपज है।
8-अधिगंम हेतु एक परिश्थिति से दूसरी परिस्थिति में स्तनंतरण होता है।
9-अधिगंम  साम्यायोजन में सहायक है।
10-अधिगम के द्वरा व्यबहार में परिवर्तन लाये जा सकते है।


सीखना या अधिगम (जर्मन: Lernen, अंग्रेज़ी: learning) एक व्यापक सतत् एवं जीवन पर्यन्त चलनेवाली प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म के उपरांत ही सीखना प्रारंभ कर देता है और जीवन भर कुछ न कुछ सीखता रहता है। धीरे-धीरे वह अपने को वातावरण से समायोजित करने का प्रयत्न करता है। इस समायोजन के दौरान वह अपने अनुभवों से अधिक लाभ उठाने का प्रयास करता है। इस प्रक्रिया को मनोविज्ञान में सीखना कहते हैं। जिस व्यक्ति में सीखने की जितनी अधिक शक्ति होती है, उतना ही उसके जीवन का विकास होता है। सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति अनेक क्रियाऐं एवं उपक्रियाऐं करता है। अतः सीखना किसी स्थिति के प्रति सक्रिय प्रतिक्रिया है।[1][2][3]
उदाहरणार्थ - छोटे बालक के सामने जलता दीपक ले जानेपर वह दीपक की लौ को पकड़ने का प्रयास करता है। इस प्रयास में उसका हाथ जलने लगता है। वह हाथ को पीछे खींच लेता है। पुनः जब कभी उसके सामने दीपक लाया जाता है तो वह अपने पूर्व अनुभव के आधार पर लौ पकड़ने के लिए, हाथ नहीं बढ़ाता है, वरन् उससे दूर हो जाता है। इसीविचार को स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करना कहते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अनुभव के आधार पर बालक के स्वाभाविक व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है।


सीखने के नियम
ई॰एल॰ थार्नडाइक अमेरिका का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक हुआ है जिसने सीखने के कुछ नियमों की खोज की जिन्हें निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया गया है[5]–
(क) मुख्य नियम (Primary Laws)
1. तत्परता का निय
2. अभ्यास का नियम
उपयोग का नियम
अनुप्रयोग का नियम
3. प्रभाव का नियम
(ब) गौण नियम (Secondary Laws)
1. बहु-अनुक्रिया का नियम
2.मानसिक स्थिति का नियम
3. आंशिक क्रिया का नियम
4. समानता का नियम
5. साहचर्य-परिर्वतन का नियम
मुख्य नियम
सीखने के मुख्य नियम तीन है जो इस प्रकार हैं -
1. तत्परता का नियम - इस नियम के अनुसार जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए पहले से तैयार रहता है तोवह कार्य उसे आनन्द देता है एवं शीघ्र ही सीख- लेता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति कार्य को करने के लिए तैयार नहीं रहता या सीखने की इच्छा नहीं होती हैतो वह झुंझला जाता है या क्रोधित होता है व सीखने की गति धीमी होती है।
2. अभ्यास का नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति जिस क्रिया को बार-बार करता है उस शीघ्र ही सीख जाता है तथा जिस क्रिया को छोड़ देता है या बहुत समय तक नहीं करता उसे वह भूलने लगताहै। जैसे‘- गणित के प्रष्न हल करना, टाइप करना, साइकिल चलाना आदि। इसे उपयोग तथा अनुपयोग ;नेम ंदक कपेनेमद्धका नियम भी कहते हैं।
3. प्रभाव का नियम - इस नियम के अनुसार जीवन में जिस कार्य को करने पर व्यक्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है या सुख का या संतोष मिलता है उन्हें वह सीखने का प्रयत्न करता है एवं जिन कार्यों को करने पर व्यक्ति पर बुरा प्रभाव पडता है उन्हें वह करना छोड़ देता है। इस नियमको सुख तथा दुःख ;च्समेंनतम ंदक च्पंदद्ध या पुरस्कार तथा दण्ड का नियम भी कहा जाता है।
गौण नियम
1. बहु अनुक्रिया नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति के सामने किसी नई समस्या के आने पर उसे सुलझाने के लिए वह विभिन्न प्रतिक्रियाओं के हल ढूढने का प्रयत्न करता है। वह प्रतिक्रियायें तब तक करता रहता है जब तक समस्या का सही हल न खोज ले और उसकी समस्यासुलझ नहीं जाती। इससे उसे संतोष मिलता है थार्नडाइक का प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखने का सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है।
2. मानसिक स्थिति या मनोवृत्ति का नियम - इस नियम के अनुसार जब व्यक्ति सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है तो वह शीघ्र ही सीख लेता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति मानसिक रूप से किसी कार्य को सीखने के लिए तैयार नहीं रहता तो उस कार्य को वह सीख नहीं सकेगा।
3. आंशिक क्रिया का नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी समस्या को सुलझाने के लिए अनेक क्रियायें प्रयत्न एवं भूल के आधार पर करता है। वह अपनी अंर्तदृष्टि का उपयोग कर आंषिक क्रियाओं की सहायता से समस्या का हल ढूढ़ लेता है।
4. समानता का नियम - इस नियम के अनुसार किसी समस्या के प्रस्तुत होने पर व्यक्ति पूर्व अनुभव या परिस्थितियों में समानता पाये जाने पर उसके अनुभव स्वतः ही स्थानांतरित होकर सीखने में मद्द करते हैं।
5. साहचर्य परिवर्तन का नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति प्राप्त ज्ञान का उपयोग अन्य परिस्थिति में या सहचारी उद्दीपक वस्तु के प्रति भी करने लगता है। जैसे-कुत्ते के मुह से भोजन सामग्री को देख कर लार टपकरने लगती है। परन्तु कुछ समय के बाद भोजन के बर्तनको ही देख कर लार टपकने लगती है।
हम सीखते कैसे हैं
सीखना चारों ओर के परिवेश से अनुकूलन में सहायता करता है। किसी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में कुछ समय रहने के पश्चात् हम उस समाज के नियमों को समझ जाते हैं और यही हमसे अपेक्षित भी होता है। हम परिवार, समाज और अपने कार्यक्षे त्र के जिम्मे दार नागरिक एवं सदस्य बन जाते हैं। यह सब सीखने के कारण ही सम्भव है। हम विभिन्न प्रकार के कौशलों को अर्जित करने के लिये सीखने का ही प्रयोग करते हैं। परन्तु सबसे जटिल प्रश्न यह है कि हम सीखते कैसे हैं ?
मनोवैज्ञानिकों ने मानवों एवं पशुओं पर अनेक प्रकार के अध्ययनों द्वारा सीखने की प्रक्रिया को समझाने का प्रयास किया है। उन्हों ने कुछ विधियाँ इं गित की हैं जिनका उपयोग सरल एवं जटिल अनुक्रियाओं को अर्जित करने में हो ता है। सीखने के दो मूल प्रकार हैं - शास्त्रीय अनुबंधन और यांत्रिक या क्रियाप्रसूत अनुबंधन। इसके अतिरिक्त वाचिक या शाब्दिक सीखना, प्रेक्षण सीखना, कौशल सीखना, और प्रत्यय सीखना आदि अन्य प्रकार भी हैं।

19. Motivation

अभिप्रेरणा का अर्थ :-
          अभिप्रेरणा शब्द का अंग्रेजी समानार्थक शब्द 'Motivation'(मोटिवेशन) जो की लेटिन भाषा के 'Motum'(मोटम) या 'Moveers'(मोवेयर) शब्द से बना है, जिसका अर्थ है 'To Move'अर्थात गति प्रदान करना। इस प्रकार अभिप्रेरणा वह कारक है, जो कार्य को गति प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में अभिप्रेरणा एक आंतरिक शक्ति है, जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। इसी लिए अभिप्रेरणा ध्यानाकर्षण या लालच की कला है, जो व्यक्ति में किसी कार्य को करने की ईच्छा एवं जिज्ञासा उत्पन्न करती है।
            शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है तथा प्रत्येक क्रिया के पीछे एक बल कार्य करता है जिसे हम प्रेरक बल कहते है। इस संदर्भ में प्रेरणा एक बल है जो प्राणी को कोई निश्चित व्यवहार या निश्चित दिशा में चलने के लिये बाध्य करती है।

अभिप्रेरणा की परिभाषायें :-

1.  स्किनर के अनुसार, “अभिप्रेरणा सिखने का सर्वोत्तम राजमार्ग  है।”

2.  गुड  के अनुसार, “अभिप्रेरणा कार्य को आरम्भ करने , जारी रखने की प्रक्रिया है।”

3.  मैक्डूगल के अनुसार, “अभिप्रेरणा वे शारीरिक ओर मनोवैज्ञानिक दशाएं है, जो किसी कार्य को करने के लिएप्रेरित करती है।”

4.  वुडवर्थ के अनुसार, “अभिप्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह समूह है, जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए निश्चित व्यवहार को स्पष्ट करती है।”

5.  गेट्स व अन्य के अनुसार, “अभिप्रेरणा प्राणी  के भीतर शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक दशा है, जो उसे विशेष प्रकार की क्रिया करने के लिए प्रेरित करती है।”

अभिप्रेरण (Motivation) का अर्थ किसी व्यक्ति के लक्ष्योन्मुख (goal-oriented) व्यवहार को सक्रिय या उर्जान्वित करना है। मोटिवेशन दो तरह का होता है - आन्तरिक (intrinsic) या वाह्य (extrinsic)। अभिप्रेरण के बहुत से सिद्धान्त हैं। अभिप्रेरण के मूल में शारीरिक कष्टों को न्यूनतमीकरण तथा आनन्द को अधिकतम् करने की मूल आवश्यकता हो सकती है; या इसके पीछे विशिष्त आवश्यकताएँ, जैसे खाना, आराम करना या वांछित वस्तुएँ, रूचि (हॉबी), लक्ष्य, आदर्श आदि हो सकते हैं। अभिप्रेरण की जड़ में कुछ अल्प-स्पष्ट कारण, जैसे - स्वार्थ, नैतिकता/अनैतिकता आदि भी हो सकते हैं।

स्व-अभिप्रेरणा (Self- motivation) 
एक पिता अक्सर अपने बच्चे को यह कहता है कि इस बार अगर कक्षा में प्रथम आया तो आपको साईकिल ला दूगां , मां अक्सर यह कहती है कि अगर मेरा बेटा दूध पी लेगा तो उसे टीवी देखने दिया जाएगा और भी ऐसे उदाहरण है जब हम रोजमर्रा की जिंदगी मे अभिप्रेरणा का उपयोग करते है । पर स्व-अभिप्रेरणा के उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते है । जब बच्चा स्वयं यह समझ लेता है कि अगर उसे आगे बढना है, स्वस्थ रहना है तो वह समय पर दूध भी पी लेगा और कक्षा में प्रथम आने के लिए तैयारी भी करेगा । परंतु स्व-प्रेरणा एक बच्चे मे ऐसे ही नही आ जाती है , इसकी शुरूआत अभिप्रेरणा से ही होती है । जब तक हम इसके लिए उसे प्रशिक्षण नहीं देंगे , स्व-प्रेरणा के लिए कदम नहीं उठाया जा सकता है । और यही बच्चा फिर व्यस्क होकर जब व्यवसाय मे उतरता है तब भी बिना किसी प्रेरणा के काम करना उसके लिए मुश्किल होता है। किसी संगठन में जब ऐसे व्यक्तियों की संख्या ज्यादा होती है तब संगठन को ऐसे में अभिप्रेरणा पर ही अधिक से अधिक समय देना पड़ता है ।
मैं जानता हूं कि ये चौंकाने वाला विषय है क्योंकि हम जानते है कि स्व-अभिप्रेरणा का निर्माण नहीं किया जा सकता , वह भी एक अभिप्रेरणा का ही रूप होगा । यदि हम शब्दों एवं मनोविज्ञान के सिद्धांतो मे न जाए तो यह संभव है । अभिप्रेरको के आधार पर अभिप्रेरणा के दो प्रकार बनाए गए है । एक बाहरी अभिप्रेरणा और दूसरी आंतरिक अभिप्रेरणा ।
अभिकर्ताओं को अभिप्रेरित करने के लिए बाह्य अभिप्रेरणा का ही प्रयोग किया जाता है । प्रत्येक माह या अवसर पर केन्द्रीय, क्षेत्रीय या मण्डल कार्यालय पर कोई न कोई प्रतियोगिता का आयोजन होता रहता है । प्रतियोगिता में कई स्तर भी होते है, जिनके आधार पर पुरस्कार वितरण होता है । अभिकर्ता उन आकर्षक पुरस्कारों की दौड़ मे शामिल होकर अधिक से अधिक बीमा उत्पाद बेचकर उन पुरस्कारों को जीतते है ।
क्या हर बार बीमा उत्पादों को बेचने के लिए प्रतियोगिता का सहारा लेना चाहिए ? क्या हम अपने अभिकर्ताओं को यह समझाने में नाकाम रहे है कि बीमा उत्पाद बेचना एक सामाजिक कल्याण , देश के आर्थिक एवं सामाजिक ढांचे और अपने संगठन को मजबूत करने का उपाय है जिसकी जिम्मेवारी प्रत्यक्ष रूप से अभिकर्ताओं की है ।
यहा गौर करने वाली बात यह है कि आंतरिक अभिप्रेरणा का उपयोग नहीं किया जाता है जिसका कारण शायद आंतरिक अभिप्रेरणा एवं स्व-अभिप्रेरणा के अंतर को ठीक से ना समझना है । आंतरिक अभिप्रेरणा वह है जब अभिकर्ता अपनी जिम्मेवारी, अपने लक्ष्य एवं उद्देश्य को ठीक से समझ सके और उसे पूर्ण करने के लिए दृढ संकल्पता के साथ काम करें । इसे पैदा करने के लिए अच्छे सेल्समेनों से मुलाकात करवाई जा सकती है, उनके जीवन दर्शन से परिचय करवाया जा सकता है एवं देश एवं समाज के प्रति उनके कर्तव्य का बोध कराना भी आवश्यक है । वे जिस सुख-सुविधा पूर्ण जीवन जीने का सपना देख रहे है , उसको साकार होते दिखाना भी जरूरी है ।
चूंकि स्व-अभिप्रेरणा में यह सब कुछ स्वयं की सोच पर निर्भर करता है, परंतु मेरा स्वयं का अनुभव है कि जब सकारात्मक सोच को पैदा किया जा सकता है तब निश्चित ही स्व-अभिप्रेरणा का भी निर्माण भी किया जा सकता है, जिसके लिए अभिकर्ताओं के वर्ष में एक से दो तक ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम होने चाहिए ।
उच्च लक्ष्य एवं सकारात्मक सोच से परिपूर्ण स्व-अभिप्रेरणा भर से आधे लक्ष्य को तो यूं ही प्राप्त किया जा सकता है । कई सफल व्यवसायियों के साक्षात्कारों मे ये बात सामने आई है। रांडा बर्ड ने अपनी पुस्तक “दी सीक्रेट” मे इस तथ्य को प्रमुखता से लिखा है कि ब्रह्मांड मे आकर्षण का सिद्धांत काम करता है। जैसा हम सोचते है , अहसास करते है , हमारे साथ ठीक वैसा ही होता है । आज आवश्यकता है कि अभिकर्ताओं को उच्च लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए और उन्हें पूरा होते देखने का अहसास करना चाहिए और इसके लिए प्रशिक्षण का प्रबन्ध होना चाहिए ।

आत्मप्रेरणा का महत्व 
 ‘‘ इंतजार करने वालों को अच्छी चीजें मिलती तो हैं, पर केवल ऐसी चीजें ही मिलती हैं, जिन्हें पहले कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं ‘‘ – अब्राहम लिंकन
सर्वप्रथम आप अपने जीवन में एक उद्देश्य की खोज पर निकल पड़ते हैं।
इससे पूर्व आप अपने अंदर ही निहित प्रतिभा को अपनी शक्ति बनाते हैं।
उसी शक्ति के सहारे आप अपनी राह में उठने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों का दमन करते है। आप अपने यथार्थ उद्देश्य की प्राप्ति करते हैं।
इस लेख में हम जानेंगे कि आत्म प्रेरणा का हमारी सफलता के लिए क्या महत्व है और हम खुद को आत्मप्रेरित कैसे करें ?
प्रेरणा क्या है ? 
प्रेरणा एक ऐसी शक्ति के रुप में काम करती है जो हमारे काम या भावनाओं में उमंग भरती है। इसी प्रकार किसी के अंदर काम करने की लगन पैदा करना, कार्यों में जोश भरना ही प्रेरित होना या प्रेरणा कहलाता है।
प्रेरणा अत्यधिक ताकतवर होती है मन में असफलता के डर को खत्म कर हमें साहसिक व गंतव्य पथ की ओर अग्रसरित करती है। हम प्रेरणा को हमारे लक्ष्य तक पहुँचने का साधन मान सकते है। प्रेरणा इतनी बलवान होती है कि किसी भी क्षण हमारी जिंदगी बदल सकती है।
आत्मप्रेरणा या आंतरिक प्रेरणा का महत्व –
लक्ष्य प्राप्ति का एहसास, व्यक्ति का खुद के प्रति सम्मान, जिम्मेदारियों का एहसास एवं विष्वास जैसी आंतरिक प्रेरणायें व्यक्ति के अंदर से ही आती है।
आत्मप्रेरणा इंसान के ह्रदय में जाग्रत होकर आपको स्वयमेव ही लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।
अक्सर एक इंसान चाहता है कि लोग उसकी प्रशंसा करें उसे मान सम्मान दें और उनसे जुड़ाव महसूस करें। यह अनुभव आत्म प्रेरणा के ही श्रोत हैं।
आत्मप्रेरणा ही है जो आपको हर समय इस प्रकार की अनुभूतियों का एहसास कराती रहती है।
कई बार जिम्मेदारियों से आप में जुड़ाव और स्वामित्व की भावना जन्म लेती है। जिम्मेदारियों से वंचित होकर आपके अंदर आत्मप्रेरणा का सैलाबघटता है।
आंतरिक प्रेरणा का महत्व समझें और जिम्मेदारियों का निश्चित बोझ जिंदगी के सिर ढोकर आप खुद को प्रेरित कर सकते है।
आत्मप्रेरणा का सहारा लेकर सफलता के उचित मार्ग पर सफर तय कर सकते हैं।
आत्म-प्रेरणाओं का अपने अंदर एहसास करें। यह हर पल आपको नये जोश और उमंग से प्रेरित कर आपका सफर तय करने में मद्द करेगी।
खुद को आत्म प्रेरित कैसे करें –
लक्ष्य का चिंतन करना –
सफलता पाने के लिए आत्म-प्रेरणा या आंतरिक प्रेरणा की जरुरत होती हैं।
आत्मप्रेरणा को खुद के अंदर जगाने का सबसे आसान तरीका है कि आप अपने लक्ष्य का सुबह-शाम चिंतन करिये।
इससे आपके अंदर निहित आत्मप्रेरणा को बल मिलता है व यह आपके भीतर नवचेतना और जुनून का निर्माण करती है।
नकारात्मक वाक्यों व शब्दों द्वारा
कई बार ऐसा हुआ होगा आपके साथ कि किसी ने आपको दिल दुखाने वाली बात की हो और उसका प्रभाव आप पर सकारात्मक दिशा पड़ा हो।
उदारण के तौर पर आप सरकारी नौकरी पाने के लिए काफी लंबे समय से मेहनत कर रहे हैं परंतु आप अभी तक सफल नहीं हो पाये हैं।
इसके चलते कभी आपके किसी अंकल, रिस्तेदार, दोस्त या पड़ोसी ने आपको दिल दुखाने वाले शब्द कह दिये हो।
जैसे ‘‘ हाँ ! तेरी लग रही है नौकरी ? ‘‘ आपके मजे लेते हुये कहा हो।
या मुँह बनाकर कहा हो – ‘‘ इससे अच्छा है तू कोई काम धंधा देख ले, नौकरी तेरे बस की बात नहीं है ‘‘
ऐसे शब्द सुनने के बाद आपको गुस्सा आया हो और आपने खुद से कहा हो कि अब मैं जल्द से जल्द नौकरी पाकर दिखाऊँगा।
इसके बाद आप अपने लक्ष्य के प्रति और अधिक अकाग्र हुये हों व उसे जल्द से जल्द पाने के लिए अधिक से अधिक मेहनत की हो।
और जब कभी भी आपको ये शब्द या वाक्य याद आते हैं तब आप अपने कॅरियर के प्रेरित अधिक गंभीर होकर मेहनत करने लगते हैं।
अगर ऐसा है तो इन शब्दों और वाक्यों को किसी डायरी पर लिख कर रख लें और इन्हें हर रोज पढ़े।
ये नकारात्मक शब्द और वाक्य आपको गुस्सा दिलायेंगे ।
गुस्से में बहुत शक्ति होती है , गुस्से में व्यक्ति असंभव दिखने वाले कार्य भी बड़ी आसानी से कर देता है।
यह सच है कि गुस्से में व्यक्ति में अक्सर गलत काम करता है ।
किंतु यदि व्यक्ति अपने क्रोध को उचित दिशा में लगा दे तो वह क्रोध की शक्ति से अपने लिए बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकता है।
अपने लक्ष्य को आसानी और जल्दी प्राप्त कर सकता है
अपने क्रोध की ताकत को अपने लक्ष्य प्राप्ति में लगायें।
अपने जीवन की पुरानी सफलतायें
आपने अपने जीवन के बीते दिनों में कुछ सफलतायें अवश्य ही प्राप्त की होंगी।
और जब उन सफलताओं के पल आपके दिमाग में आते हैं तो आपका मनोबल सर्वोच्च शिखर पर होता है।
इस दौरान आप अपने आप में महसूस करते हैं कि आप कुछ भी कर सकते हैं । आप बड़ी से बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
अब आपको सिर्फ इतना करना है कि उन सफलता के पलों को याद करके आपका मन जैसा आत्मविश्वास महसूस करता है वैसा ही आत्मविश्वास आपको बनाये रखने की जरूरत है।
इसके लिए आप उन सफलता के पलों को कहीं भी अपने पास सुरक्षित रखिये कि आप उन्हें अक्सर मेहसूस कर सके।
आप अपनी सफलता की तस्वीरें, अवार्ड, कहीं किसी डायरी पर कुछ लिख लें या मोबाईल में रिकॉर्ड कर रखें और उन्हें अक्सर महसूस करें।
ऐसा करने से आपको आत्मप्रेरणा मिलेगी व आप अपने लक्ष्य के प्रति अधिक अकाग्र व तेजी से आगे बढ़ोगे।
अपने आस पास के सफल लोगों से आत्मप्रेरित हो
मैने अपने अनुभव से एक बात जानी है कि हमें बिल गेट्स, रतन टाटा, अब्राहम लिंकन, विराट कोहली आदि शायद इतनी प्रेरणा नहीं देते हैं ।
जितनी की वह व्यक्ति जो हमारे गाँव या शहर से हो, जिसकी परिस्थितियाँ हमारी जैसी हो और वह उसी छेत्र में सफल हुआ हो जिस छेत्र में हम सफल होना चाहते हैं।
इस लिए यह भी बहुत महत्वपूर्ण कि हम उस व्यक्ति के संपर्क में रहें जो उसी फील्ड में सफल हुआ है।---
जिस फील्ड में हम सफल होना चाहते हैं और उसकी भी वैसी ही परिस्थितियाँ थी जैसी की आप की हैं।
ऐसा -व्यक्ति आपको प्रेरणा देने के साथ-साथ महत्वपूर्ण मार्गदर्शन भी दे सकता है।
स्वयं को मान्यता दें –
खुद को प्रेरित करने के लिए सर्वप्रथम स्वयं को यह मान्यता दें कि आप श्रेष्ठ हैं और सफलता के अग्रिम- सफर को तय करने में बलशाली है।
खुद को महसूस कर स्वयं के होने की एक पहचान दीजिए।
स्वयं को उस रूप में महसूस करिये जिस रूप में आप खुद की पहचान बनाना चाहते हैं।
हर पल खुद के मस्तिष्क में उस छवि को बिठाकर रखिए जो सफलता प्राप्त कर लेने के पश्चात आपको हासिल होगी।
हर पल उस रूप में खुद को सोचते रहने के कारण यकीनन ही आपके ह्रदय में स्वप्रेरणा का संचार होगा
नव स्फूर्ति के साथ आप अपने गंतव्य पथ पर बलशाली व लक्ष्य तक के अंतिम पड़ाव तक सफर तय करने का जज्वा रखेंगे।
खुद को इज्जत दें –
यह बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु को दर्शाता है यदि आप चाहते हैं कि कोई आपकी इज्जत करे, तब आप खुद को पहले इज्जत दें।
जब तक आप खुद को इज्जत नहीं दोगे तब तक आपके अंदर यह विश्वास नहीं पनपेगा कि कोई अन्य आपको इज्जत दे तो क्यों दे ? इसलिए सबसे पहले खुद को इज्जत दें।
काम को रोमोंचक मोड दें –
इस विषय से मतलब है कि आप अपने लक्ष्य तक के पड़ाव को अत्यधिक रोमांचक अथवा एक खेल की तरह बनायें। यह भी खुद को प्रेरित करने जैसा ही है।
बल्कि यदि आप ऐसा ही करते हैं तब यकीनन ही आप अपने लक्ष्य तक के मुश्किल सफर को आसानी में तब्दील कर सकते हो।
चुनौती पेश करें –
यदि आप स्वयं ही चाहते है कि आपके लक्ष्य तक के रास्ते में मुश्किल से मुश्किल चुनौतियों का भी सामना कर सकने तक का साहस रखते है तब यकीनन ही आपके ह्रदय में स्वप्रेरणा का एहसास हो रहा है।
आत्मप्रेरणा की जरूरत हमे तब सबसे अधिक होती है जब आप सचमुच ही वह सब चाहते हो जो आप हासिल करना चाहते हैं ।
आपको न केवल प्रेरणा, आत्मप्रेरणा और इसके महत्व को समझने की जरूरत है बल्कि स्वयं को प्रेरित करते रहना भी हमें हमारे लक्ष्यों को हासिल कराने में मद्द करते हैं।